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चुल्लू भर पानी में डूब मरो !

Posted On: 8 Jun, 2013 Others में

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रे शिखंडियो ! मौन तोड़ अब
कुछ तो आज करो !

क्रूर – नीच पाकिस्तानी है नंगा नाच रहा
पग-पग पर है आज मौत की आयत बाँच रहा

लड़ो नहीं तो चुल्लू भर
पानी में डूब मरो ! रे शिखंडियो ……

क्या है तेरी मजबूरी ये हम भी जान रहे
छुद्र स्वार्थवश बेच देश के तुम अभिमान रहे

जन-मन की भावना समझकर
आगे आज बढ़ो ! रे शिखंडियो ………..

उधर चीन आँखे तरेंरकर तुमको घुड़क रहा
और इधर तू दुम सुट्काकर बिल में दुबक रहा
कायरता को तजो और
कर में गांडीव धरो ! रे शिखंडियो ……….

बाह्य शत्रु से खतरनाक अन्दर के काले लोग
हंस बने ये कंस लगाते हैं मोती के भोग

कहाँ छुपे हो कृष्ण ! प्रजा का
आकर कष्ट हरो ! रे शिखंडियो …………..

नीच – भ्रष्ट – शोषक बनकर नक्सल को जन्म दिए
जर- ज़मीन – वन से तुमने उनको बेदखल किये

कम से कम अपनों की लाशों पर
मत अब गणित बरो ! रे शिखंडियो ………..!!

–आचार्य विजय गुंजन (५\५\१३)

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33 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ashokkumardubey के द्वारा
June 17, 2013

बहुत अच्छा आलेख आज के नेताओं और देश की सरकार में बैठे मंत्रियों और अधिकारीयों को यह कविता पढनी चाहिए और देश हित के लिए सही कदम उठाना चाहिए पर इन सब बैटन को नेता कभी पढ़ते नहीं न कोई सरोकार रखते हैं केवल और केवल अपना कार्यकाल सरकार में पूरा करते हैं जनता के पैसों पर ऐश करते हैं उनके लिए क्या फर्क पड़ता है चीन ने अपना कितना क्षेत्र कब्ज़ा में ले लिया या पाकिस्तान ने कितने आतंकवादी सीमा के इस पार भेज दिया अपना देश कहने को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है पर यहाँ लोक के लिए कोई तंत्र नहीं है हाँ यहाँ गन -तंत्र जरुर है जो माओवादियों ने उठा रखा है

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    June 21, 2013

    मान्य अशोक दूबे जी साभिवादन !….. आप ने बिलकुल सही कहा इन नेताओं व अधिकारियों को कविता तथा कला- संस्कृति से कोई लेना-देना नहीं ! इन्हें तो अपनी कुर्सी के अतिरिक्त कुछ दिखाई नहीं देता , देश भांड में जाए ! प्रतिक्रियार्थ आभारी हूँ ! पुनश्च !

bhagwanbabu के द्वारा
June 17, 2013

जोशपूर्ण कविता … बधाई…

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    June 21, 2013

    मान्य भाई भगवान जी, सादर अभिवादन ! संक्षिप्त किन्तु अर्थपूर्ण प्रतिक्रियार्थ आभारी हूँ ! सधन्यवाद !

yogi sarswat के द्वारा
June 17, 2013

बाह्य शत्रु से खतरनाक अन्दर के काले लोग हंस बने ये कंस लगाते हैं मोती के भोग कहाँ छुपे हो कृष्ण ! प्रजा का आकर कष्ट हरो ! रे शिखंडियो ………….. नीच – भ्रष्ट – शोषक बनकर नक्शल को जन्म दिए जर- ज़मीन – वन से तुमने उनको बेदखल किये कम से कम अपनों की लाशों पर मत अब गणित बरो ! रे शिखंडियो ………..!! आदरणीय आचार्य जी, सादर अभिवादन! ये शिखंडी कब जागेंगे? जागेंगे भी या नहीं? ये अँधेरा घना छा रहा … देखें, एक आश का सूरज निकल है, कल क्या होगा देखना है! बहुत सुन्दर

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    June 21, 2013

    मान्य भाई सादर !…उत्साह बर्धन हेतु आभारी हूँ ! पुनश्च !

harirawat के द्वारा
June 16, 2013

आचार्या विजय गुंजन जी, आप स्वयं आचार्या हैं, इतने सुसंस्कृत शब्दों द्वारा सुसंस्कृत शासको को सभ्यता का मार्ग दर्शन कराकर उनकी औकात बता देना विजय गुंजन नाम धारी ही कर सकते हैं ! विजय जी देश के इन शकुनी, जयचंद, धृत राष्ट्र अंधे बहरे को बहुत अच्छी लताड़ लगाई है आपने ! इसके लिए आप बधाई के पात्र हैं ! आप मेरे ब्लॉग में आये निशान रूप में टिप्पणी के पुष्प गिरा गए, बहुत बहुत धन्यवाद !

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    June 21, 2013

    मान्यवर हरि रावत जी , सादर !…….आप की सुन्दरतम प्रतिक्रिया ने मेरी रचना प्रक्रिया को संबल दिया आभारी हूँ ! पुनश्च !!

alkargupta1 के द्वारा
June 13, 2013

आचार्य जी , देश की वर्तमान स्थिति पर अर्थपूर्ण ओजस्वी आह्वान ….. श्रेष्ठ कृति के लिए बधाई

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    June 14, 2013

    मान्या अलका जी, साभिवादन ! आप की सकारात्मक प्रतिक्रिया से रचनात्मकता को बल मिला ! आभारी हूँ !

rashmisri के द्वारा
June 12, 2013

आचर्य जी ,सामयिक कविता के लिए बधाई !

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    June 13, 2013

    मान्या रश्मि जी, नमस्ते !….मेरे ब्लॉग पर आप का सहर्ष स्वागत है , साथ ही प्रतिक्रियार्थ आभार भी ! पुनश्च !

Sushma Gupta के द्वारा
June 12, 2013

आचार्य गुंजन जी, नमस्कार , देश की वर्तमान दशा को दर्शाकर ,उसको धूमिल करने बाले कर्णधारों को सही फटकार लगाईं है ,पर वे कर्ण-हीन इस बात को सुने और समझें ,तब न ..बहुत सार्थकता है रचना में ,वधाई

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    June 13, 2013

    मान्या सुषमा जी, सादर !……… सराह्नार्थ आभारी हूँ ! रचनात्मक सहयोग व सम्बन्ध बनाए रखें ! साभार !

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
June 12, 2013

कम से कम अपनों की लाशों पर मत अब गणित बरो ! रे शिखंडियो आदरणीय आचार्य जी सादर अभिवादन अवाहन , ललकार इनके आगे सब बेकार , ये बड़े मक्कार बधाई

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    June 13, 2013

    परम आदरणीय प्रदीप जी, सादर प्रणाम ! आप ने बिलकुल ठीक कहा ये लोग तो जन्मजात मक्कार होते हैं ! हार्दिक आभार !

priti के द्वारा
June 12, 2013

सुन्दर और सार्थक आह्वाहन ! हार्दिक बधाई ! आचार्य जी..

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    June 13, 2013

    मान्या प्रीति जी , सादर !….. प्रथमतः मेरे ब्लॉग पर आप का हार्दिक स्वागत है | प्रतिक्रियार्थ आभारी हूँ ! सहयोग व सम्बन्ध बनाए रखें ! सधन्यवाद !

aman kumar के द्वारा
June 12, 2013

नीच – भ्रष्ट – शोषक बनकर नक्शल को जन्म दिए जर- ज़मीन – वन से तुमने उनको बेदखल किये कम से कम अपनों की लाशों पर मत अब गणित बरो ! रे शिखंडियो ………. आपके लेख मे सच्चाई है ! आभार http://amankumaradvo.jagranjunction.com/?p=93#कमेंट्स नक्सलबाद जहर ! के कारन और निवारण !jagran juntion fourm

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    June 13, 2013

    मान्य भाई अमन जी , सादर अभिवादन !……..सराह्नार्थ आभारी हूँ ! मेरे ब्लॉग पर आप का सदैव स्वागत है | सादर !

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
June 11, 2013

छुद्र स्वार्थवश बेच देश के तुम अभिमान रहे जन-मन की भावना समझकर आगे आज बढ़ो ! रे शिखंडियो ……….. उधर चीन आँखे तरेंरकर तुमको घुड़क रहा और इधर तुम दुम सुट्काकर बिल में दुबक रहा प्रिय आचार्य जी बहुत सुन्दर …धमाकेदार चेतावनी …काश आँखें खुल पायें इनकी …..हम तो इन्हें कहेंगे और इधर तू दुम सुट्काकर बिल में दुबक रहा जय श्री राधे भ्रमर ५

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    June 13, 2013

    मान्य भ्रमर जी, साभिवादन !……… आप ने बिलकुल ठीक कहा मुद्रण की हड़बड़ी में तू की जगह तुम हो गया ! प्रतिक्रियार्थ आभारी हूँ ! पुनश्च !

anilkumar के द्वारा
June 11, 2013

आचार्य विजय गुंजन जी , देश की भावनाओॆ की सटीक अभिव्यक्ति आपकी इस सुन्दर कविता में ।  बधाई ।

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    June 13, 2013

    AADARNEEY ANIL JEE , SABHIVAADAN !MERE BLOG PAR AAP KAA SWAGAT HAI ! SAHYOG VA SAMBANDH BANAE RAKHEN ! DHANYVAAD !

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    June 13, 2013

    आदरणीय अनिल जी, सदर अभिवादन !…… सुन्दर प्रतिक्रियार्थ आभारी हूँ ! रचनात्मक सहयोग बनाए रखें ! धन्यवाद !

allrounder के द्वारा
June 11, 2013

नमस्कार आचार्य गुंजन जी …. जबरदस्त आह्वान करती रचना पर हार्दिक बधाई !

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    June 13, 2013

    मान्यवर महोदय , सादर !……. सानुकूल प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ ! सहयोग व सम्बन्ध बनाए रखें ! सधन्यवाद !

jlsingh के द्वारा
June 10, 2013

बाह्य शत्रु से खतरनाक अन्दर के काले लोग हंस बने ये कंस लगाते हैं मोती के भोग कहाँ छुपे हो कृष्ण ! प्रजा का आकर कष्ट हरो ! रे शिखंडियो ………….. नीच – भ्रष्ट – शोषक बनकर नक्शल को जन्म दिए जर- ज़मीन – वन से तुमने उनको बेदखल किये कम से कम अपनों की लाशों पर मत अब गणित बरो ! रे शिखंडियो ………..!! आदरणीय आचार्य जी, सादर अभिवादन! ये शिखंडी कब जागेंगे? जागेंगे भी या नहीं? ये अँधेरा घना छा रहा … देखें, एक आश का सूरज निकल है, कल क्या होगा देखना है!

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    June 13, 2013

    आदरणीय भाई जे.एल.सिंह जी, सादर अभिवादन !……अगर ये अब भी नहीं जागे तो तो इनका सर्वनाश तय है! हार्दिक धन्यवाद !

nishamittal के द्वारा
June 9, 2013

बहुत सार्थक आह्वान आचार्य जी. बाह्य शत्रु से खतरनाक अन्दर के काले लोग हंस बने ये कंस लगाते हैं मोती के भोग कहाँ छुपे हो कृष्ण ! प्रजा का आकर कष्ट हरो ! रे शिखंडियो …

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    June 9, 2013

    bahut-bahut aabhaaree hoon nisha jee ! saadar ! vastutah is rachna ko main ne ek mah purv likha tha , sanganak kharab hone ke kaaran vilamb se post kar saka !

shalinikaushik के द्वारा
June 8, 2013

कम से कम अपनों की लाशों पर मत अब गणित बरो ! रे शिखंडियो ………..!! बिलकुल सही कहा विजय जी आपने .

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    June 9, 2013

    sarahnarth aabharee hoon ! shalini jee, sadhanyavad !


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