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हा-हा करती बाढ़ दानवी

Posted On: 28 Aug, 2013 Others में

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कैसी यह बरसात ओ भगवन कैसी यह बरसात
चारों तरफ तबाही -बर्बादी की बिछी बिसात
ओ भगवन कैसी यह बरसात !

स्वप्न बुने थे हमने , दुनिया होगी हरी-भरी
मगर विधाता की, किस कारण भृकुटी आज चढ़ी

भूख-महामारी फैली है बिगड़े हैं हालात
ओ भगवन कैसी यह बरसात !

पशु -धन का छय हुआ और सारे घर-वार दहे
कितनों के परिवार बिखरकर जाने कहाँ बहे

हा-हा- करती बाढ़ दानवी लगे भयावह रात
ओ भगवन कैसी यह बरसात !

काल बना विकराल रहा कर भू पर नंगा नाँच
मौत रही है सर्वनाश की कटुक कथा अब बाँच

शेष बच गई है हिस्से में विपदा की बारात
ओ भगवन कैसी यह बरसात !

जल का हुआ प्रलय ऐसा सारे जग-जंतु मरे
जर-जजात सब लता-गुल्म हैं डूबे हरे-भरे

दिखती है हर ओर यहाँ अब दुःख की घिरी कनात
ओ भगवन कैसी यह बरसात !

बहे जा रहे छह्लाए कुछ मृतकों के चप्पल
उपलाए हैं दहे जा रहे कुछ लाशों के दल

यह कैसी प्रभु तुमने भेजी खुशियों की सौगात
ओ भगवन कैसी यह बरसात !

भूखे बच्चे हैं मचान पर जीवन काट रहे
वे कहते दिन -रात वहाँ हम राहत बाँट रहे

मुरझा गए खिले पलकों में सपनों के जलजात
ओ भगवन कैसी यह बरसात !

– विजय “गुंजन”

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16 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ushataneja के द्वारा
September 11, 2013

आदरणीय आचार्य गुंजन जी, आपका ब्लॉग सच में संग्रहणीय है|

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    September 20, 2013

    आदरणीया उषा तनेजा जी , सादर अभिवादन ! सर्व प्रथम मेरे ब्लौग पर आप का हार्दिक स्वागत है साथ ही उत्साहवर्धन हेतु आभार भी ! सहयोग व सम्बन्ध बनाए रखें ! पुनश्च !!

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
September 4, 2013

बाढ़ की विभीषिका का सटीक चित्रण ,आचार्य विजय जी .

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    September 8, 2013

    आदरणीय राजीव जी, प्रणाम !उत्साह्बर्धन के लिए आभारी हूँ !

yogi sarswat के द्वारा
September 2, 2013

पशु -धन का छय हुआ और सारे घर-वार दहे कितनों के परिवार बिखरकर जाने कहाँ बहे हा-हा- करती बाढ़ दानवी लगे भयावह रात ओ भगवन कैसी यह बरसात ! काल बना विकराल रहा कर भू पर नंगा नाँच मौत रही है सर्वनाश की कटुक कथा अब बाँच शेष बच गई है हिस्से में विपदा की बारात ओ भगवन कैसी यह बरसात ! जल का हुआ प्रलय ऐसा सारे जग-जंतु मरे जर-जजात सब लता-गुल्म हैं डूबे हरे-भरे दिखती है हर ओर यहाँ अब दुःख की घिरी कनात ओ भगवन कैसी यह बरसात ! कायनात हमसे रूठ कर अपना रौद्र रूप दिखा रही है आजकल ! आपने इसी विभीषिका को सुन्दर शब्दों में लिखा है श्री आचार्य जी !

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    September 8, 2013

    भाई योगी सारस्वत जी, साभिवादन !सराहना से बल मिला ! शुक्रिया !

yatindrapandey के द्वारा
September 1, 2013

हैलो सर बहुत ही सुन्दर लेखनी जल का हुआ प्रलय ऐसा सारे जग-जंतु मरे जर-जजात सब लता-गुल्म हैं डूबे हरे-भरे ये पंक्तिया बेहद सुन्दर लगी यतीन्द्र पाण्डेय

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    September 8, 2013

    आदरणीय पाण्डेय जी , नमस्तुभ्यं ! ….प्रतिक्रियार्थ आभारी हूँ ! पुनश्च !

seemakanwal के द्वारा
September 1, 2013

BADH की विभीषिका का साक्षात् मंज़र .आभार

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    September 8, 2013

    मान्या सीमा जी, सादर !…. आभारी हूँ !

jlsingh के द्वारा
September 1, 2013

आदरणीय आचार्य जी, सादर अभिवादन! बहुत ही कारुणिक दृश्य होता है बाढ़ की विभीषिका ..आपने बड़ा करूँ दृश्य खींचा है! ईश्वर सबकी रक्षा करें!

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    September 1, 2013

    आदरणीय जे.एल. सिंह जी , सादर अभिवादन !….. सराह्नार्थ आभारी हूँ ! पुनश्च !

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
September 1, 2013

आदरणीय आचार्य जी बाढ़ की विभीषिका और प्रकृति के तांडव को आँखों के सामने दिखाती अच्छी रचना आइये सब मिल को प्रकृति को छेड़ने से बचें ..बचपन में गाँव में नदी का किनारा बाढ़ ऐसे दृश्य याद आये ….रातों का जागना हर समय तट पर जा जा चिन्ह लगाना भयावह भ्रमर ५

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    September 1, 2013

    मान्यवर भ्रमर जी , सादर !….. उत्साह्बर्धन हेतु आभार ! पुनश्च !

September 1, 2013

काल बना विकराल रहा कर भू पर नंगा नाँच मौत रही है सर्वनाश की कटुक कथा अब बाँच satya

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    September 1, 2013

    शालिनी जी, सादर !….. आप को पंक्तियाँ अच्छी लगीं , अच्छा लगा ! आभारी हूँ !


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