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तन में मलय अनिल की खुशबू

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तुम भी प्यासी मैं भी प्यासा
प्यासा पूरा अम्बर है !
उतर रहा अब हर सीने में
नयन कोर बन खंजर है !!

वयःसंधि पर मुखर मोहिनी
निखर हुई अलवेली है ,
झुके-झुके मद भरे नयन की
भाषा बनी पहेली है |

चंचल चितवन की गहराई
मानों सात समुन्दर है !
तुम भी ………..!!

धीरे-धीरे खोल रहा है
मन का कोई अवगुंठन
सोलह सावन नहा-नहा कर
देह हो गई है कुंदन |

अभी-अभी फूटा गिरि के अंतर से नूतन निर्झर है !
तुम भी प्यासी मैं भी प्यासा, प्यासा पूरा अम्बर है !!

तन में मलय अनिल की खुशबू
मन तेरा है वृन्दावन
बहकाता भँवरे के मन को
रह-रहकर है मस्त पवन |

ऊसर उर का कोना-कोना हुआ आज फिर उर्वर है !
तुम भी प्यासी मैं भी प्यासा प्यासा पूरा अम्बर !!

– आचार्य विजय ” गुंजन “

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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
November 26, 2013

तुम भी प्यासी मैं भी प्यासा प्यासा पूरा अम्बर है ! उतर रहा अब हर सीने में नयन कोर बन खंजर है !! वयःसंधि पर मुखर मोहिनी निखर हुई अलवेली है , झुके-झुके मद भरे नयन की भाषा बनी पहेली है | चंचल चितवन की गहराई मानों सात समुन्दर है ! तुम भी ………..!! प्रारम्भ ही इतने सुन्दर शब्दों से है कि दिल करता वाह , क्या शब्द लिखे हैं ! अति सुन्दर श्री आचार्य जी ! एक से बढ़कर एक मोटी निकल रहे हैं आप अपने पिटारे में से !

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    November 26, 2013

    यह सब आप जैसे भाई की हार्दिकता के चलते ही सम्भव हो पाता है ! बहुत-बहुत आभार !!

harirawat के द्वारा
October 17, 2013

आचार्य विजय जी, आपकी कविता में एक खिंचाव है ‘जो पथिक को खिंच लेता है अपनी ओर, जब बयार चलती पूरब की और पवन में हल्का शोर, ये है आप जैसे कवियों का दौर ! शुभ कामनाओं के साथ ! आप मेरे ब्लॉग में आए, अपनी प्रतिक्रया रुपया पुष्प पंखुड़िया चढ़ा गए, इसका धन्यवाद करता हूँ ! हरेन्द्र जागते रहो

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    October 17, 2013

    आदरणीय रावत जी , सादर अभिवादन ! आप की उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ ! कृपा बनाए रखें !सधन्यवाद !

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
October 16, 2013

धीरे-धीरे खोल रहा है मन का कोई अवगुंठन सोलह सावन नहा-नहा कर देह हो गई है कुंदन | आदरणीय आचार्य जी …अद्भुत ..वियोग रस और श्रृंगार की बाँहे थामे प्रेम को ह्रदय में समेटे खूब बनी ….ऊसर उर का कोना-कोना हुआ आज फिर उर्वर है !….क्या बात है .. हरा भरा हो जाएगा सब मन का आंगन कोना कोना कालिदास के बदरा उमड़े मिटा विरह चातक का रोना भ्रमर ५

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    October 17, 2013

    मान्य भाई भ्रमर जी, सप्रेम नमस्कार ! मन गदगद हो गया ! आभारी हूँ ! पुनश्च !!

jlsingh के द्वारा
October 3, 2013

तन में मलय अनिल की खुशबू मन तेरा है वृन्दावन बहकाता भँवरे के मन को रह-रहकर है मस्त पवन | ऊसर उर का कोना-कोना हुआ आज फिर उर्वर है ! तुम भी प्यासी मैं भी प्यासा प्यासा पूरा अम्बर !! हरे कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी! मैं भी प्यासा तू भी प्यासी पास में देख समंदर है ! वाह वाह गुरुदेव!

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    October 6, 2013

    आदरणीय भाई सिंह जे.एल. सिंह जी, सादर अभिवादन ! यह तो भाई शाश्वत और अकाट्य सत्य है , गिरधारी तो इसके स्थूल अदाहरण हैं ! उत्साह बढ़ा ! हार्दिक धन्यवाद !

yatindranathchaturvedi के द्वारा
September 30, 2013

अद्भुत, बधाई, सादर

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    October 6, 2013

    आदरणीय मान्यवर , सादर ! अति संक्षिप्त किन्तु गहरी प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ !

nishamittal के द्वारा
September 29, 2013

अत्यंत सुन्दर सधी रचना आचार्य जी बधाई

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    October 6, 2013

    श्रद्धेया निशा जी, सादर अभिवादन ! आप की कृपा प्राप्त कर धन्य हूँ !

Santlal Karun के द्वारा
September 29, 2013

आदरणीय विजय गुंजन जी, आप ने मिलन-वसंतोसव पूर्व की उत्कंठा के उद्वेलन की समग्र संवेदनात्मक को इस छायावादी शैली के छोटे-से वियोग गीत में जैसे उड़ेल दिया है; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! … “धीरे-धीरे खोल रहा है मन का कोई अवगुंठन सोलह सावन नहा-नहा कर देह हो गई है कुंदन | अभी-अभी फूटा गिरि के अंतर से नूतन निर्झर है !”

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    October 6, 2013

    श्रद्धेय करुण जी , सादर ! आप की विपंचात्मक प्रतिक्रिया से उत्साहवर्धन हुआ ! हार्दिक आभार !


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