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कई मनोरम सुन्दर सपने

Posted On: 23 Oct, 2013 Others में

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कुछ ऐसे भी क्षण होते हैं
स्वप्न सुनहले
मन बोते हैं !

रागों के अनुप्रास शब्द सम
और विषम स्वर के
संगम हैं ,
थिरक ह्रदय के रंग-मंच पर
रहे भाव के सुर-
सरगम हैं |

पुलक लगाते महानन्द के
सिन्धु-अतल में
नित गोते हैं !…कुछ ऐसे …….

सिंदूरी सौंदर्य छिटकते
जब अनुपम वैभव
ले अपने
अंतर में तब सजने लगते
कई मनोरम
सुन्दर सपने |

इन्द्रधनुष के सात रंग में
डूब-डूबकर
सुधि खोते हैं ! …..कुछ ऐसे ……

शुभ्र चांदनी जलधि-तरंगों पर
जब अपने डग
भरती है ,
लगता तब जलपरी सँवर
कोई थल पर विचरण
करती है |

अक्षर-अक्षर-शब्द-शब्द बन
भाव-वितल में
पग धोते हैं !
कुछ ऐसे भी
क्षण होते हैं !!

आचार्य विजय ” गुंजन ”

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20 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

meenakshi के द्वारा
November 28, 2013

सुन्दर कविता , आचार्य विजय ” गुंजन “ अनेक २ शुभकामनाएं . मीनाक्षी श्रीवास्तव

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    November 28, 2013

    मीनाक्षी जी , पुनः आभारी हूँ !पुनश्च !1

sanjay kumar garg के द्वारा
November 28, 2013

“कुछ ऐसे भी क्षण होते हैं……” बहुत सुन्दर कविता, मन के तार वीणा की तरह बज उठे, बधाई व् आभार! विजय जी !

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    November 28, 2013

    aadarneey bhaai garg jee , haardik aabhaar !1

yogi sarswat के द्वारा
November 26, 2013

शुभ्र चांदनी जलधि-तरंगों पर जब अपने डग भरती है , लगता तब जलपरी सँवर कोई थल पर विचरण करती है | अक्षर-अक्षर-शब्द-शब्द बन भाव-वितल में पग धोते हैं ! कुछ ऐसे भी क्षण होते हैं !! अति सुन्दर शब्द श्री आचार्य जी !

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    November 26, 2013

    धन्यवाद भाई ! आभारी हूँ ! पुनश्च !

sadguruji के द्वारा
November 9, 2013

आदरणीय आचार्य विजय गुंजन जी,आप बहुत अच्छे कवि हैं.”तन में मलय अनिल की खुशबू,मन तेरा है वृन्दावन” और “कुछ ऐसे भी क्षण होते हैं स्वप्न सुनहले मन बोते हैं !” दोनों ही कविताएं बहुत अच्छी है.शुभकामनाओं सहित.

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    November 19, 2013

    श्रद्धेय सद्गुरु जी , सादर अभिवादन !आप की उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया से हौसला बढ़ा ! आभारी हूँ ! पुनश्च !

harirawat के द्वारा
November 1, 2013

दिल के तारों में झंकार, बहुत सुन्दर रस भरी कविता के लिए साधुवाद विजय जी ! दीपावली कि शुभ कामनाएं आपको और आपके परिवारको ! हरेन्द्र जागते रहो !

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    November 1, 2013

    श्रद्धेय हरि रावत जी , सादर अभिवादन ! प्रतिक्रियार्थ आभारी हूँ ! दीपावली की अशेष मंगल कामनाएं !! पुनश्च !!

jlsingh के द्वारा
October 26, 2013

शुभ्र चांदनी जलधि-तरंगों पर जब अपने डग भरती है , लगता तब जलपरी सँवर कोई थल पर विचरण करती है | ऐसा लगता है, आपने समुद्र किनारे बैठकर कर कविता लिखी है! बहुत ही मनोहारी! सुन्दर शब्द संयोजन … बहुत बहुत बधाई! आचार्य जी!

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    October 26, 2013

    आदरणीय भाई सिंह जी, सादर अभिवादन !…..उत्साहवर्धक सम्मति के लिए हार्दिक आभार ! पुनश्च !!se

deepakbijnory के द्वारा
October 25, 2013

anupam  ,ati  sunder bahut sunder kavia सीधी साधी परन्तु विलक्षण विजय जी

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    October 25, 2013

    आदरणीय दीपक जी , सादर !……. उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ ! पुनश्च !!

Madan Mohan saxena के द्वारा
October 25, 2013

सुदर प्रस्तुति . रोचक ,सार्थक और प्रभाबशाली . कभी इधर भी पधारें सादर मदन

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    October 25, 2013

    मान्य भाई मदन जी, सादर !……प्रतिक्रियार्थ आभारी हूँ ! शेष फिर !

nishamittal के द्वारा
October 24, 2013

अति सुन्दर साहित्यिक रचना आदरनीय आचार्य जी.

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    October 25, 2013

    श्रद्धेया निशा जी , साभिवादन !… आभारी हूँ ! फेस बुक पर मैं हूँ और ज़ल्द ही अंगना में मिलूंगा ! सादर !1

October 23, 2013

सिंदूरी सौंदर्य छिटकते जब अनुपम वैभव ले अपने अंतर में तब सजने लगते कई मनोरम सुन्दर सपने | बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति .

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    October 25, 2013

    शालिनी जी, नमस्ते !….पंक्तियाँ आप को अच्छी लगीं , तदर्थ आभारी हूँ ! पुनश्च !


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