kavita

meri bhavnaon ka sangrah

66 Posts

1656 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 9493 postid : 684328

' मौन ' कविता ( कांटेस्ट )

Posted On: 10 Jan, 2014 Others,कविता,Contest में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

मौन जब टूटता है
तो टूटकर बिखर जाती हैं
अंतर्द्वंद्व की करोड़ों कोशिकाएँ
आस-पास के परिवेश में .
बड़ा ही भयावह और विषाक्त
होता है उसका बिखराव
क्योंकि मौन के बज्रगृह में
उमड़-घुमड़कर
टकरा- टकराकर
पाषाणी घेरों के परकोटों से
वह हो जाता है फेनिल
और धीरे-धीरे
पाता है विराम
पुनः महीनों – वर्षों और
युगों- युगों तक
जमक- जमककर
बजबजाते सड़ांधीय परिवेश में
हो जाता वह
तेजाबी शक्तियों से संपन्न !!
आचार्य विजय ‘ गुंजन ‘

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

6 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

vaidya surenderpal के द्वारा
January 14, 2014

सुन्दर भावपूर्ण कविता विजय जी।

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 15, 2014

    मान्यवर ! हार्दिक आभार !

ranjanagupta के द्वारा
January 12, 2014

सुन्दर ,विघटन का सशक्त वर्णन !मौन का ,घुटन का ,पीड़ा का !!!सार्थक ता के साथ!!बधाई !!

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 12, 2014

    सारगर्वित प्रतिक्रियार्थ आभारी हूँ आदरणीया रंजना जी ! पुनश्च !!

harirawat के द्वारा
January 10, 2014

विजय गुंजन जी हकीकत जिंदगी कि बयां करने पर बधाई ! हरेन्द्र जागते रहो

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 11, 2014

    आदरणीय हरि रावत जी , सादर ! प्रतिक्रियार्थ आभारी हूँ ! पुनश्च !!


topic of the week



latest from jagran