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'अपने मन के रिक्त आँगन में' कविता-( कांटेस्ट )

Posted On: 15 Jan, 2014 Others,कविता,Contest में

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अब नहीं सोते हैं लोग
घर की छतों पर
नहीं लेते हैं सुख
दूधिया चाँदनी रातों के
और नहीं निहार पाते हैं
खुली आँखों से एकटक
गतिमान टिमटिमाते तारों को #
नहीं भर पाते हैं अपने मन में
आकाश के छिपे
अनगिन रहस्यों के भेद
नहीं भिंगोकर तृप्त कर पाते हैं
अपने तन-मन
शुभ्र ज्योत्स्ना की शीतलता में #
नहीं उतार पाते हैं
अपने मन के रिक्त आँगन में
आकाश के अर्थपूर्ण मौन #
लोग विवश हैं
सोने को दुबककर
घरों के अंदर
क्यों कि दहशत
अब उतर आते हैं छतों पर
पिछवाड़े से #
आचार्य विजय ” गुंजन ”

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30 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
January 24, 2014

नहीं भर पाते हैं अपने मन में आकाश के छिपे अनगिन रहस्यों के भेद नहीं भिंगोकर तृप्त कर पाते हैं अपने तन-मन शुभ्र ज्योत्स्ना की शीतलता में # नहीं उतार पाते हैं अपने मन के रिक्त आँगन में आकाश के अर्थपूर्ण मौन # लोग विवश हैं सोने को दुबककर घरों के अंदर क्यों कि दहशत अब उतर आते हैं छतों पर पिछवाड़े से # भावनाप्रधान शब्दों से सजी सार्थक रचना !

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 24, 2014

    भाई योगी जी , सप्रेम नमस्कार !सुन्दर सराहनार्थ आभारी हूँ ! पुनश्च !

yatindrapandey के द्वारा
January 21, 2014

हैलो सर बहुत सुन्दर और सत्य रचना मेरे दिल को छू गयी आभार यतीन्द्र

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 21, 2014

    मान्य यतीन्द्र जी , सप्रेम नमस्कार ! मेरे ब्लॉग पर आप स्वागत है ! रचना आप को अच्छी लगी तदर्थ आभारी हूँ ! सब्बंध व सहयोग बनाए रखें !पुनश्च !

Madan Mohan saxena के द्वारा
January 21, 2014

सुन्दर भाबपूर्ण प्रस्तुति . बढ़िया है आभार मदन कभी इधर नही पधारें

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 21, 2014

    भाई मदन जी ! हार्दिक आभार ! पुनश्च !

anilkumar के द्वारा
January 20, 2014

 आदरणीय गुजंन जी , यह कविता आज के कटु सत्य की अभिव्यक्ति है। यथार्थ का सुन्दर चित्रण । बधाई ।

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 21, 2014

    भाई अनिल जी , सादर ! सर्वप्रथम मेरे ब्लॉग पर आप का स्वागत है | सुन्दर सराहना के लिए आभारी हूँ !पुनश्च !

vaidya surenderpal के द्वारा
January 19, 2014

.सुन्दर भाव से परिपूर्ण अभिव्यक्ति। बहुत सुन्दर….।

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 21, 2014

    आभार वैद्य सुरेंदर पाल जी !

DR. SHIKHA KAUSHIK के द्वारा
January 18, 2014

bahut bhavpoorn rachna hetu aabhar

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 19, 2014

    धन्यवाद डॉ. शिखा जी !

yamunapathak के द्वारा
January 18, 2014

गुंजन जी एक यथार्थ भाव से परिपूर्ण कविता बहुत सुन्दर साभार

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 19, 2014

    सम्मानया यमुना जी, साभिवादन!उत्साहवर्धक प्रतिक्रियार्थ आभारी हूँ ! पुनश्च !

alkargupta1 के द्वारा
January 17, 2014

आचार्य जी , सदा की भांति अति सुन्दर श्रेष्ठ कृति

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 17, 2014

    बहुत-बहुत आभार अलका जी ! सादर !

jlsingh के द्वारा
January 17, 2014

पर जिनके सर पे छत नहीं है वे तो निहार पाते हैं न चाँद को तारों को नीले आकाश को जब बिजली नहीं होती रातों में तब तो चाँद की रोशनी ही ठंढक पहुँचाती है तन मन को… मैं केवल तर्क दे रहा हूँ ..आपकी कविता अपनी जगह पर शिष्ट और सुन्दर है…. आदरणीय श्री गुंजन जी.

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 17, 2014

    आदरणीय भाई जे, एल. सिंह जी, नमस्कार ! अपनी छत नहीं हुई तो क्या? बगलवाले की है न ! हार्दिक आभार !

Santlal Karun के द्वारा
January 16, 2014

अब और तब के अंतर को स्पष्ट करती तथा तब के प्राकृत जीवन का महत्तव प्रतिपादित करती मार्मिक कविता; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 17, 2014

    आदरणीय संतलाल करुण जी , सादर अभिवादन !उत्साहवर्धक मंतव्य से अनुप्राणित हूँ !

January 16, 2014

सादर प्रणाम! अब तो सब कुछ बनावटी सा हो गया………….

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 17, 2014

    बिकते नकली बीज हैं विष भी बिके अशुद्ध ! मरने का भी रास्ता हुआ यहाँ अवरुद्ध !………..अलीन जी हार्दिक आभार !

sadguruji के द्वारा
January 16, 2014

आचायजी बधाई.बहुत बेहतर कविता.श के अर्थपूर्ण मौन # लोग विवश हैं सोने को दुबककर घरों के अंदर क्यों कि दहशत अब उतर आते हैं छतों पर पिछवाड़े से #

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 17, 2014

    श्रद्धेय सद्गुरु जी , सादर प्रणतिः ! सुन्दर सद्भावना प्राप्त कर अनुगृहीत हूँ !

nishamittal के द्वारा
January 16, 2014

सदा की भांति सुन्दर रचना आचार्य जी

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 17, 2014

    श्रद्धेया निशा जी , साभिवादन ! सदाशयता के लिए आभारी हूँ ! पुनश्च !

ranjanagupta के द्वारा
January 16, 2014

गुंजन जी !आपने पुराने समय की याद दिला दी ,जब हम लोग छतो पर सफ़ेद चादरों में चांदनी रात में लेट कर चाँद सितारों का अद्भुत सौन्दर्य निहारा करते थे !वह समय कभी नहीं भूलता !अब दहश त के कारण कोई छत पर सोने के विषय में सोंच भी नहीं सकता ! बधाई !

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 17, 2014

    रंजना जी आभारी हूँ !समय बदल चुका है आज हमलोग बदले परिवेश में जीने को विवश हैं ! सादर !

January 15, 2014

कभी मंकी मेन तो कभी सरियामार गिरोह ये कारण भी तो हैं .सुन्दर भावात्मक अभिव्यक्ति .

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 17, 2014

    हार्दिक आभार शालिनी जी ! सादर !


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