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" बिम्ब टटके कई गीत में भर लिए " कविता- ( कांटेस्ट )

Posted On: 19 Jan, 2014 कविता,Contest में

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नींद कच्ची अधूरी नयन में भरे अड़चनों से झगड़ते रहे रातभर !
=
बढ़ चले फिर रुके रुक लगे सोंचने
ठोकरों ने बहुत बार झटके दिए,
पर घना धुंध का आवरण जब छँटा
बिम्ब टटके कई गीत में भर लिए |
=
कल्पना के अतल सिंधु में डूबकर छंद पर छंद गढ़ते रहे रातभर !
नींद कच्ची अधूरी नयन में भरे अड़चनों से झगड़ते रहे रातभर !!

=
अर्थ टूटे कई भाव छितरा गए शब्द के जाल में
मन उलझता रहा ,
चित्र कितने बने औ’ मिटे पर मगर भावना का
अमल स्रोत बहता रहा |
=
अनगिनत चिंतनों की जटिल सीढ़ियां बिन रुके दौड़ चढ़ते रहे रातभर !
नींद कच्ची अधूरी नयन में भरे अड़चनों से झगड़ते रहे रातभर !!
=
कब गए छूट कब राह पर आ गए कब मिलीं
भाव से शब्द की शक्तियाँ,
साधना-गंध से कब सुगन्धित हुईं सिद्ध-संपन्न ,
इस गीत की पंक्तियाँ |=
=
मन रमा इस तरह छंद के बंध में गुन ऋचा टेक पढ़ते रहे रात भर !
नींद कच्ची अधूरी नयन में भरे अड़चनों से झगड़ते रहे रातभर ! !
आचार्य विजय ‘ गुंजन ‘

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12 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
January 25, 2014

आदरनीय विजय जी, एक बेहद स्तरीय कविता , अभिनन्दन , निर्मलासिंह गौर

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 25, 2014

    MAANYAA NIRMALAA JI ! SADAASHAYTAA KE LIE AABHAAREE HOON ! PUNASHCH !!

January 23, 2014

अर्थ टूटे कई भाव छितरा गए शब्द के जाल में मन उलझता रहा , चित्र कितने बने औ’ मिटे पर मगर भावना का अमल स्रोत बहता रहा ………..बहुत खूब………..श्रीमान………………..

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 23, 2014

    अनिल जी हार्दिक धन्यवाद ! शेष फिर !!

UMASHANKAR RAHI के द्वारा
January 20, 2014

वधाई बंधुवर

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 21, 2014

    मान्यवर ! सर्वप्रथम मेरे ब्लॉग पर आप का हार्दिक अभिनन्दन है और प्रतिक्रियार्थ हार्दिक बधाई ! सादर !

jlsingh के द्वारा
January 20, 2014

मन रमा इस तरह छंद के बंध में गुन ऋचा टेक पढ़ते रहे रात भर ! नींद कच्ची अधूरी नयन में भरे अड़चनों से झगड़ते रहे रातभर ! ! अब रातों को नींद नहीं आ रही बस सभी छंद टेक पद आदि गढ़ने में लगे हैं… सादर आचार्य गुंजन जी!

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 21, 2014

    अब क्या कहें भाई जबाहर जी ! बयार ही ऐसी बह चली है परिवेश में रहने के नाते प्रभावित होना तो लाजिमी है | हार्दिक धन्यवाद !

January 19, 2014

कब गए छूट कब राह पर आ गए कब मिलीं भाव से शब्द की शक्तियाँ, साधना-गंध से कब सुगन्धित हुईं सिद्ध-संपन्न , इस गीत की पंक्तियाँ | बहुत ही सुंदर आचार्य विजय जी

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 21, 2014

    धन्यवाद सुधीर जी ! उत्साहवर्धक प्रतिक्रियार्थ !

ranjanagupta के द्वारा
January 19, 2014

नींद कच्ची अधूरी …..बेहद सुन्दर भाव ..भाषा..!!!

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 19, 2014

    गीत धर्मिणी रंजना जी ! हार्दिक धन्यवाद !


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