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" मेनका श्रृंगार फिर करने लगी है " गीत-गंधी ग़ज़ल ( कांटेस्ट )

Posted On: 19 Jan, 2014 Contest में

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बिखरे पन्नों को जमा फिर कर रहा हूँ ,
रंग उनमें फिर सुनहले भर रहा हूँ |
=
झील सी ठहरी किसी की आँखों में मैं
स्वच्छ झरने की तरह फिर झर रहा हूँ |
=
कल्पनाएँ ले रहीं अंगड़ाइयां हैं
हवाओं के संग गगन में तर रहा हूँ |
=
मेनका श्रृंगार फिर करने लगी है
अडिग विश्वामित्र मैं फिर डर रहा हूँ |
=
दूसरा दुष्यंत कोई आ न धमके
आश्रमी इतिवृत्त से फिर डर रहा हूँ |
=
कल्पना के पंख का उन्मेष कम कर
फिर धरा की ओर मुड़ के उतर रहा हूँ |
=
कण्व का आश्रम युवा फिर हो गया है
रोककर रथ वहीं आज ठहर रहा हूँ |
=
आचार्य विजय ” गुंजन ”

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26 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

acharyashivprakash के द्वारा
February 16, 2014

आचार्य श्री सादर सप्रेम नमन …आपको गजल के प्रथम विजेता के रूप में देखकर ह्रदय गदगद हो उठा …..मुझे बहुत आनंदानुभूति हो रही है …गोस्वामी तुलसीदास जी की एक चौपाई याद आ गयी …आजू सुफल जप जोग बिरागू….आजू सुफल ताप तीरथ त्यागू …और अपना एक शेर याद आ गया ..खुदा करे आपका सर्वत्र सम सम्मान हो …वेदना दुःख दर्द गम का तुमको कभी न भान हो …मिल जाए साडी मंजिलें जो ख्वाबों में सजाई है …कीमत तो हम चुका देंगे भले कीमत हमारी जान हो ….आचार्य वर बहुत बहुत बधाई ….मेनका श्रृंगार फिर करने लगी है अडिग विश्वामित्र मैं फिर डर रहा हूँ |…श्रृंगार को पराकाष्ठा पर पहुचाया है ..बहुत ही सुन्दर लिखते है आप ….

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    February 16, 2014

    आचार्य शिव प्रकाश जी , सादर नमन ! यहाँ भी आप को साथ पाकर मैं अति उत्साहित हूँ ! फेस बुक पर तो आप काफी चर्चित हैं ही यहाँ भी आप से यही उम्मीद है | आप की प्रतिक्रिया से तो मन में हलचल सी मच गई | हार्दिक आभार !

R K KHURANA के द्वारा
February 10, 2014

आचार्य जी, प्रथम पुरस्कार के लिए आपको बधाई ! राम कृष्ण खुराना

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    February 11, 2014

    आदरणीय मान्यवर , सादर अभिवादन ! समर्थन और हार्दिकता के लिए अनुगरीत हूँ साथ मेरे ब्लॉग आप का सदैव स्वागत है !

Alka के द्वारा
January 25, 2014

आचार्य जी , बहुत ही उत्कृष्ट रचना .| सुन्दर शब्दों और भावों कि अनूठी अभिव्यक्ति … बधाई ……

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 25, 2014

    आदरणीया अलका जी , सादर !अर्सा बाद सुन्दर सराहना के रूप में साक्षात्कार हो रहा है ! कृपया मंच पर उपस्थिति बनाए रखें | इधर हाल के दिनों में कई अभिन्नों की अनुपस्थिति बराबर खलती है |

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
January 25, 2014

आचार्य गुंजन जी ,पूरी की पूरी रचना सर्वोत्तम है ,बधाई सादर शुभ कामनाएं निर्मला सिंह गौर

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 25, 2014

    सराहना के सुन्दर शब्दों से आप्यायित हूँ ! हार्दिक आभार !

yogi sarswat के द्वारा
January 24, 2014

झील सी ठहरी किसी की आँखों में मैं स्वच्छ झरने की तरह फिर झर रहा हूँ | = कल्पनाएँ ले रहीं अंगड़ाइयां हैं हवाओं के संग गगन में तर रहा हूँ | = मेनका श्रृंगार फिर करने लगी है अडिग विश्वामित्र मैं फिर डर रहा हूँ | = दूसरा दुष्यंत कोई आ न धमके आश्रमी इतिवृत्त से फिर डर रहा हूँ बहुत सुन्दर शब्द श्री आचार्य जी !

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 25, 2014

    आदरणीय भाई सारस्वत जी ! अनुगृहीत और अनुप्राणित हूँ ! हार्दिक आभार !

vaidya surenderpal के द्वारा
January 23, 2014

मेनका श्रृंगार फिर करने लगी है अडिग विश्वामित्र मैं फिर डर रहा हूँ | .बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल, आचार्य विजय गुंजन जी।

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 24, 2014

    हार्दिक धन्यवाद सुरेन्द्र पाल जी ! पुनश्च !

sanjay kumar garg के द्वारा
January 23, 2014

“मेनका श्रृंगार फिर करने लगी है, अडिग विश्वामित्र मैं फिर डर रहा हूँ |” बहुत ही सुन्दर पक्तिया दिल में गहराई तक उतर गयी हैं! बधाई हो आदरणीय आचार्य जी!

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 23, 2014

    संजय जी आभारी हूँ ! पुनश्च !

January 23, 2014

आदरणीय! ………………………………….बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल……………..

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 23, 2014

    पुनश्च आभार ! अनिल जी सादर! सप्रेम !!

vikaskumar के द्वारा
January 23, 2014

भाव सुन्दर ,शब्द -चयन सुन्दर .एक कलात्मक रचना .

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 23, 2014

    आप के मूल्यायांकन से बल मिला !विकास जी हार्दिक आभार !

jlsingh के द्वारा
January 20, 2014

अब तो मेनका शकुंतला सब अवतरित होने लगी हैं इसी तरह मंच जे जे का युवा अब हो रहा है! शीत ऋतु अब जाने को है शशिर और बसंत आने ही वाला है बाग़ के गुलाब और डलिया अपने यौवन पर है तितलियाँ छटपटा रही हैं … और मैं क्या कहूँ मैं बहुत ही आनंदातिरेक का अनुभव कर रहा हूँ …

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 21, 2014

    आदरणीय भाई , सादर ! ज़रा खुद को संभालकर रखियेगा , कहीं मौसम बदलने के साथ -साथ आप भी न बदल जायं ! हार्दिक आभार !

Santlal Karun के द्वारा
January 19, 2014

आदरणीय गुंजन जी, आप ने इस गीत में काव्य-प्रसिद्ध सन्दर्भों को नवीनता प्रदान की है | यह पंक्तियाँ विशेष रूप से ध्यान आकृष्ट कर रहीं हैं — “मेनका श्रृंगार फिर करने लगी है अडिग विश्वामित्र मैं फिर डर रहा हूँ |” XXX “कण्व का आश्रम युवा फिर हो गया है रोककर रथ वहीं आज ठहर रहा हूँ |” … इस नव गीत के लिए हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 21, 2014

    श्रद्धेय संतलाल करुण जी ! सादर अभिवादन ! ” XXX ” प्रतिक्रिया – सुन्दर सद्भावना तथा सुमधुर सदाशयता के साथ ही उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया से अनुगगृहीत हूँ ! पुनश्च !

ranjanagupta के द्वारा
January 19, 2014

गुंजन जी !आभिज्ञान शाकुंतलम की प्रभावोत्पादकता से परिपूर्ण कविता !सादर !!

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 21, 2014

    आदरणीया रंजना जी , सादर ! सुन्दर मंतव्य हेतु हार्दिक आभार !

sadguruji के द्वारा
January 19, 2014

आचार्यजी,आपकी कविता दिल को छू गई.बहुत अच्छी रचना करने के लिए मेरी बधाई स्वीकार कीजिये.ये पंक्तियाँ मुझे बहुत पसंद आई-झील सी ठहरी किसी की आँखों में मैं सवच्छ झरने की तरह फिर जहर रहा हूँ |इसमें आचार्यजी थोड़ी सी टाइपिंग मिस्टेक है,चूँकि रचना कांटेस्ट में जा रही है,इसलिए जरुर ठीक कर लीजियेगा.१=सवच्छ=स्वच्छ और २= जहर=झर.आप के लिए मेरे ह्रदय में बहुत सम्मान है.आप की रचनाये मुझे पसंद हैं.शाब्दिक त्रुटियों कि और ध्यान दिलाया,इसे अन्यथा न लीजियेगा.सादर प्रेम और कांटेस्ट के लिए मेरी शुभकामनायें.

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 21, 2014

    श्रद्धेय सद्गुरु जी , सादर अभिवादन ! दुबारा पढ़ने के क्रम में मुद्रण-दोष का ज्ञान हुआ | दोनों ही भूलों को सुधार लिया है ! उत्साह बढ़ाने हेतु आप का सदैव आभारी रहता हूँ ! पुनश्च !


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