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दो ग़ज़लें (कांटेस्ट )

Posted On: 22 Jan, 2014 Others में

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घोल ‘गुंजन’ ग़ज़ल में शहद प्यार का ( एक )
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आज अपना वतन ही बेगाना हुआ हक़ की खातिर लड़े तो हर्जाना हुआ |
नाक नीचे से मुजरिम गुज़र चल गया
घर निरपराध का ही निशाना हुआ |
पाक सदियों से जो था सदन अबतलक आज पाखंडियों का ठिकाना हुआ |
मेरे व्रण पर लवण नित छिड़कते रहे
उफ़ जरा कर दिया तो बहाना हुआ |
न्याय पाने की उम्मीद में था चला
भर उम्र के लिए क़ैदखाना हुआ |
घोल गुंजन ग़ज़ल में शहद प्यार का
है चमन मुल्क़ का क़ातिलाना हुआ |
*
मुशायरे की जगह पर मुजरे हुए ( दो )
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कितने ज़माने हो गए गुज़रे हुए
दिल टूट टुकड़ों में कई मिसरे हुए |
जो थे बसे कलतक सड़क के हाशिये
अहले सहर ही वे दिखे उजड़े हुए |
जब-जब गिरी है गाज उनके ताज़ पर
तब-तब वही बदहाल हैं मुहरे हुए |
चोर की चोरी गई बढ़ती यहाँ
जब भी अधिक जितने कड़े पहरे हुए |
हैं जो ज़माने से रहे छलते हमें
वे ही मियाँ सर पर सजे सेहरे हुए |
साहित्य का संगम वहाँ पर था हुआ
मुशायरे की जगह पर मुजरे हुए |
आचार्य विजय ‘ गुंजन ‘

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20 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
January 31, 2014

बहुत खूब दोनों ग़ज़ल

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 31, 2014

    मान्या यमुनाजी ! सादर आभार !

Madan Mohan saxena के द्वारा
January 31, 2014

बहुत सुन्दर गुन्जन जी

sanjay kumar garg के द्वारा
January 27, 2014

“साहित्य का संगम वहाँ पर था हुआ मुशायरे की जगह पर मुजरे हुए |” आदरणीय आचार्य जी, सुन्दर अभिव्यक्ति!

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 28, 2014

    गर्ग जी बहुत-बहुत आभार !

सौरभ मिश्र के द्वारा
January 27, 2014

बहुत सुन्दर गुन्जन जी आपने नयी प्रकार की गज़ल लिखी जिसमे शुद्ध हिन्दी है

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 28, 2014

    सौरभ जी आप ने ठीक कहा ! उर्दू की ग़ज़ल से हिंदी की ग़ज़ल का इतिहास पुराना है , एतद्विषयक लेख की आवश्यकता है | हार्दिक आभार ! पुनश्च !

Bhagwan Babu Shajar के द्वारा
January 27, 2014

बहुत खूब कहा आपने.. बधाई….

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 28, 2014

    मान्यवर ! हार्दिक आभार !

vaidya surenderpal के द्वारा
January 27, 2014

संदेशप्रद खूबसूरत गजलें, बधाई विजय गुंजन जी।

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 28, 2014

    हार्दिक आभार आदरणीय ! पुनश्च !

ranjanagupta के द्वारा
January 27, 2014

बहुत कटु सत्य का उद्घाटन !बधाई आचार्य गुंजन जी !!

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 28, 2014

    हार्दिक आभार ! रंजना जी ! पुनश्च !

DR. SHIKHA KAUSHIK के द्वारा
January 23, 2014

चोर की चोरी गई बढ़ती यहाँ जब भी अधिक जितने कड़े पहरे हुए | बहुत ही सटीक व् सुन्दर .बधाई

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 23, 2014

    धन्यवाद डॉ. शिखा जी ! पुनश्च !

January 23, 2014

सादर प्रणाम! व्यक्ति और व्यवस्था की दुरी तय कराती हुई रचना……………….सार्थक और सुन्दर……………..

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 23, 2014

    अलीन जी , सप्रेम अभिवादन ! सराहना और आप की सदाशयता ही हमारा सम्बल है ! हार्दिक आभार !

jlsingh के द्वारा
January 22, 2014

बहुत ही सुन्दर आदरणीय गुंजन जी, ब्यवस्था पर चोट करती हुई समसामयिक गजल … बधाई और शुभकामनायें!

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 22, 2014

    धन्यवाद आदरणीय भाई जी ! शेष फिर ! शब्-आ -खैर !!!


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