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" नूर में ज्यों नहाई हुई चांदनी "

Posted On: 23 Jan, 2014 Others,कविता,Contest में

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beautiful-indian-women-painting-art आप का रूप ज्यों चांदनी की चमक दामिनी की दमक से भरे अंग हैं !
=
दूध से यों धुली देह कुन्दन लगे
नूर में ज्यों नहाई हुई चांदनी
मद चुए मदभरे नैन से अनवरत
मुग्ध मुग्धा बनी लग रही कामिनी
=
सृष्टि-करतार ने निज सृजन के समय आप में भर दिए नव कई रंग हैं !
आप का रूप ज्यों चांदनी की चमक दामिनी की दमक से भरे अंग हैं !!
=
ओष्ठपुट बंद यों ज्यों कमल को किसी
सूर्य की है प्रतीक्षा मनः प्राण से
कौन जिसके ह्रदय की कली प्रस्फुटित
हो रही आप की मंद मुस्कान से
=
नर्म बाहें बदन मरमरी सुर्ख लव आप की हर अदा के अलग ढंग हैं !
आप का रूप ज्यों चांदनी की चमक दामिनी की दमक से भरे अंग हैं !!
=
आप के पीतवर्णी मृदुल कर-तलों में
कलाएँ कुलाँचें सदा भर रहीं
काल के पृष्ठ पर किस नवाध्याय का
तर्जनी के सहारे सृजन कर रहीं
=
आज मन्मथ मदी से मधुर वृत्तियाँ रागिनी की यहाँ कर रहीं जंग हैं !
आप का रूप ज्यों चांदनी की चमक दामिनी की दमक से भरे अंग हैं !!
आचार्य विजय ‘ गुंजन ‘

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24 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
January 30, 2014

आप के पीतवर्णी मृदुल कर-तलों में कलाएँ कुलाँचें सदा भर रहीं काल के पृष्ठ पर किस नवाध्याय का तर्जनी के सहारे सृजन कर रहीं = आज मन्मथ मदी से मधुर वृत्तियाँ रागिनी की यहाँ कर रहीं जंग हैं ! आप का रूप ज्यों चांदनी की चमक दामिनी की दमक से भरे अंग हैं !! गजब के शब्द लिखे हैं आपने श्री गुंजन जी !

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    February 3, 2014

    भाई योगी सारस्वत जी , सदार ! बहुत-बहुत आभार ! बस यों ही हौसला बढ़ाते रहें !

yatindrapandey के द्वारा
January 28, 2014

बेहद सुन्दर और नयी तरह की रचना मुझे बहुत पसंद आई

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    February 3, 2014

    हार्दिक आभार यतीन्द्र जी ! पुनश्च !

sadguruji के द्वारा
January 28, 2014

नर्म बाहें बदन मरमरी सुर्ख लव आप की हर अदा के अलग ढंग हैं ! आप का रूप ज्यों चांदनी की चमक दामिनी की दमक से भरे अंग हैं !!आचर्यजी लाजबाब कविता.आपको बधाई और कांटेस्ट के लिए शुभकामनाये,

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 28, 2014

    श्रद्धेय सद्गुरु जी ‘ सादर ! अनुगृहीत हूँ ! आप की रचना पर दी गई प्रतिक्रिया पता नहीं कहाँ गुम हो जाती है ! कभी एरर बताता है तो कभी वो भी नहीं !!

Santlal Karun के द्वारा
January 27, 2014

आदरणीय गुंजन जी, यह नारी-सौन्दर्य तथा संयोग श्रृंगार की क्लासिक रचना है –  “ओष्ठपुट बंद यों ज्यों कमल को किसी सूर्य की है प्रतीक्षा मनः प्राण से कौन जिसके ह्रदय की कली प्रस्फुटित हो रही आप की मंद मुस्कान से” …हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 28, 2014

    आदरणीय संतलाल करुण जी, सादर नमन ! आप की कृपा प्राप्त कर अनुगृहीत हूँ ! आप की प्रतिक्रिया ने इस रचना को स्तरीयता प्रदान कर मुझे धन्य कर दिया ! हार्दिक सादर आभार !!

ANAND PRAVIN के द्वारा
January 25, 2014

इधर आया हुआ था सर……इतनी प्रभावी कविता देख न रुक पाया…….. अनमोल…….बहुत ही सुन्दर कृति सर…….लिखते रहें

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 25, 2014

    धन्यवाद प्रिय अनुज कल्प आनंद प्रवीण जी ! मैं ने ‘ चेहरे की किताब ‘ पर अपने मित्रों की श्रेणी में का नाम लिखकर दर्ज़ का लिया है ! वहाँ भी अक्सर मुलाक़ात होती रहेगी !

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
January 25, 2014

    आदरणीय विजय गुंजन जी,आपकी कविता मनमोहक है , काल  के प्रष्ठ पर किस नवाध्याय का ,तर्जनी के सहारे स्रजन कर रहीं . बहुत उम्दा ,बधाई , निर्मलासिंह गौर

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 25, 2014

    सम्मानया निर्मला जी , सादर ! प्रथमतः तो मेरे ब्लॉग पर आप का सदैव सादर स्वागत हैं ! रुचिकर और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया से अनुगृहीत हूँ ! हार्दिक आभार ! पुनश्च !!

jlsingh के द्वारा
January 25, 2014

आदरणीय श्री गुंजन जी, सादर अभिवादन! आपकी हर कविता एक “तरासी” हुई “मूर्ति” सी प्रतीत होती है, और उनमे यथोचित रंग भी वैसे भरे हैं मानो अब शकुंतला आ ही टपकी! सुन्दर प्रस्तुति के लिए सादर आभार!

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 25, 2014

    आदरणीय भाई , सादर अभिवादन ! मेरी रचना पर आप की अमूल्य अभिव्यक्ति अतिरिक्त प्रेम का प्राकट्य है और अप्रतिम अपनत्व का द्योतक ! तहे दिल से शुक्रिया ! पुनर्दर्शनाय !!

sanjay kumar garg के द्वारा
January 24, 2014

आदरणीय आचार्य गुंजन जी, सादर नमन! आप की सुन्दर रचना को पढ़कर मुझे “बिहारी जी” का दोहा, “अंग-अंग नाग जगमगत दीप शिखा सी देह………” याद आ गया, वास्तव में आपकी हर कविता एक “तरासी” हुई “मूर्ति” सी प्रतीत होती है, सुन्दर प्रस्तुति के लिए सादर आभार!

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 25, 2014

    मान्य संजय गर्ग जी सप्रेम नमस्कार ! मनभावन मंतव्य से उत्साह बढ़ा | हार्दिक बधाई !

Madan Mohan saxena के द्वारा
January 24, 2014

सुन्दर भाबपूर्ण ,सरस कबिता सादर मदन कभी इधर भी पधारें

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 25, 2014

    धन्यवाद भाई ! मदन जी , पता नहीं क्यों ? प्रेषित प्रतिक्रिया आप तक नहीं पहुँच नहीं पा रही है !

January 24, 2014

नर्म बाहें बदन मरमरी सुर्ख लव आप की हर अदा के अलग ढंग हैं ! आप का रूप ज्यों चांदनी की चमक दामिनी की दमक से भरे अंग हैं !! ……………………बहुत खूब……………………

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 24, 2014

    सप्रेम नमस्कार और हार्दिक आभार अलीन जी !

ranjanagupta के द्वारा
January 24, 2014

गुंजन जी!अतिशय अभिनन्दन !और बहुत बहुत बधाई !इतनी सुन्दर गीतात्मकता भरी मधुर कविता के लिए !!शब्दों का संयोजन विरल है !

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 24, 2014

    रंजना जी , सादर नमस्कार ! आत्मीयतापूर्ण प्रतिक्रिया तथा सुन्दर सद्भावनार्थ आभारी हूँ ! पुनश्च !

yamunapathak के द्वारा
January 24, 2014

गुंजन जी बहुत सुन्दर कविता है.शब्द बहुत अच्छे हैं.

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    January 24, 2014

    मान्या यमुना जी ! हार्दिक आभार !


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