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रिश्तों के मौजों की गई रबानी परदेशी

Posted On: 31 Jan, 2014 Others,Contest में

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नहीं मिलेंगे इसमें राजा – रानी परदेशी !
सुनो सुनाता हूँ मैं एक कहानी परदेशी !!
=
जीवन जटिल कठिन है जीना
पर्वत से हैं दिन ,
अभिलाषाओं को घेरे हैं
महाजनों के ऋण |
=
घात लगाए इज्जत पर है दानी परदेशी !
सुनो सुनाता हूँ मैं एक कहानी परदेशी !!
=
छल – छद्मों के सर्प चतुर्दिक
पथ में फन काढ़े
निर्निमेष है दृष्टि गड़ाए
लख तन-मन हारे |
=
अपनी नहीं सभी की बनी ज़ुबानी परदेशी !
सुनो सुनाता हूँ मैं एक कहानी परदेशी !!
=
जाती – पाति बन गई कसौटी
मेधा रही सिसक ,
वाद और परिवादों के
घेरों में रही भटक |
=
रिश्तों के मौज़ों की गई रवानी परदेशी !
सुनो सुनाता हूँ मैं एक कहानी परदेशी !!
=
भावुकता का मरण हो गया
जड़ता नाँच रही ,
धूम – धाम से कर्मकांड की
पोथी बाँच रही |
=
सूख गई वह दिल की नदी हिमानी परदेशी !
सुनो सुनाता हूँ मैं एक कहानी परदेशी !!
=
पीड़ा औ’ संत्रासों के नित
छंद नए रचते ,
दूर – दूरतक वे उनसे
सम्बन्ध नहीं रखते |
=
घड़ियाली उनकी आँखों का पानी परदेशी !
सुनो सुनाता हूँ मैं एक कहानी परदेशी !!
=
छोड़ साधना ठकुरसुहाती में
रत हैं दिन – रात ,
ऐसे में कैसे बन पायेगी
गरिमा की बात |
=
कैसे द्वार खोल दे अपना वाणी परदेशी !
सुनो सुनाता हूँ मैं एक कहानी परदेशी !!
आचार्य विजय ‘ गुंजन ‘

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15 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
February 10, 2014

भावुकता का मरण हो गया जड़ता नाँच रही , धूम – धाम से कर्मकांड की पोथी बाँच रही | = सूख गई वह दिल की नदी हिमानी परदेशी ! सुनो सुनाता हूँ मैं एक कहानी परदेशी !! आचार्य जी आपके इन शब्दों की जितनी प्रशंसा करी जाए उतनी कम होगी ! अत्यंत सुन्दर !

Sonam Saini के द्वारा
February 5, 2014

आदरणीय सर नमस्कार …..बेहद लाजवाब रचना ….

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    February 5, 2014

    स्नेहिल सोनम जी, सस्नेह ! प्रथमतः स्वागत है आप का मेरे ब्लॉग पर | प्रतिक्रियार्थ आभारी हूँ !

sadguruji के द्वारा
February 5, 2014

लाजबाब पंक्तियाँ-जीवन जटिल कठिन है जीना पर्वत से हैं दिन , अभिलाषाओं को घेरे हैं महाजनों के ऋण |आचार्याजी,आपको बहुत बहुत बधाई और कांटेस्ट के लिए मेरी और से हार्दिक शुभकामनाएं.

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    February 5, 2014

    श्रद्धेय सद्गुरु जी, प्रणतिः ! आप की सद्भावना से सदैव संतृप्त होता रहता हूँ ! सादर आभार !!

deepakbijnory के द्वारा
February 5, 2014

= जाती – पाति बन गई कसौटी मेधा रही सिसक , वाद और परिवादों के घेरों में रही भटक | = रिश्तों के मौज़ों की गई रबानी परदेशी ! सुनो सुनाता हूँ मैं एक कहानी परदेशी !! वह VIJAI JI BAHOOT KHOOB

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    February 5, 2014

    दीपक जी ! सर्वप्रथम मेरे ब्लॉग पर आप का स्वागत है ! आते रहें क्यों कि बिजनौर से मेरा पुराना ताल्लुक़ात है | स्व. मेघा सिंह चौहान मेरे बड़े भाई तुल्य थे , पत्रकार \ कवि योगेन्द्र जी व बाल साहित्यकार डॉ. प्रो.जनमेजय सरीखे कई अभिन्न वहाँ मेरे मित्र हैं और अब आप भी ! प्रतिक्रियार्थ आभारी हूँ ! पुनश्च !!

harirawat के द्वारा
February 4, 2014

आचार्य जी आखिर ये दिल ही तो है, बहाने लगता है सरिता की तरह, सभी को साथ लेकर, भला. बुरा, सच्चा झुटा, पवित्र अपवित्र, कवी की लेखनी अविरल गति से धारा बनकर बहती है, बहुत सुन्दर आचार्या जी, साधुवाद ! harendr

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    February 5, 2014

    आदरणीय हरि रावत जी , सादर ! सारगर्वित मंतव्य के लिए आभारी हूँ ! पुनश्च !!

sanjay kumar garg के द्वारा
February 3, 2014

“छल – छद्मों के सर्प चतुर्दिक पथ में फन काढ़े निर्निमेष है दृष्टि गड़ाए लख तन-मन हारे |” अतीव सुन्दर कविता के लिए आभार आदरणीय आचार्य जी!

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    February 3, 2014

    मान्य भाई संजय गर्ग जी, साभिवादन ! आप का समर्थन रचनाशीलता को बल प्रदान करता है | हार्दिक आभार !!

jlsingh के द्वारा
February 2, 2014

बहुत ही सुन्दर कविता आदरणीय गुंजन जी, आपलोग दिनरात कविता की साधना में लगे रहते हैं. मई भी चाहता हूँ कविता लिखना कर भाव,शब्द मात्र और नियम के चक्कर में उलझ कर रह जाता हूँ. फिर भी जागरण मंच का वातावरण बहुत ही अच्छा और साहित्यिक होता जा रहा है. अपनी रचनाएं देते रहें! सादर!

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    February 3, 2014

    आदरणीय भाई जबाहर जी, सादर अभिवादन !आप ने ठीक कहा जागरण-मंच का वातावरण और सम्पूर्ण परिवेश मानों ‘सत्यं-शिवं-सुन्दरम्’ के भावों में समाहित सा हो गया है | यह सब देखकर तन-मन दोनों ही स्वस्थ हो जाते हैं | एतदर्थ जागरण-मंच से जुड़े जागरण-परिवार वाकई धन्यवाद के पात्र हैं | हार्दिक आभार भाई !!

ranjanagupta के द्वारा
February 2, 2014

गुंजन जी |आपकी कहानी सच है|और क्या कहे !इस देश कि दुर्दशा पर !बहुत बनावटी दुनिया है !बहुत साधुवाद !

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    February 3, 2014

    हार्दिक आभार रंजना जी ! सादर !


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