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मगर अतृप्त मन फिर भी.......

Posted On: 9 Feb, 2014 Others,कविता,Contest में

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C6302J बहुत अच्छे मुझे लगते
तुम्हारे प्रेम के दोहे !
=
हृदय में चासनी सी घोलती
हरपल मधुर पाती,
मृदुलतम भावनाओं से पगी
सौगात है लाती |
=
नयन-युग बाट अपलक राह में
हरकार की जोहे !
बहुत अच्छे मुझे लगते
तुम्हारे प्रेम के दोहे !!
=
निमंत्रण के सभी अक्षर
अपरिचित नेह में डूबे,
पले पुलकित ह्रदय की घाटियों में
रोज मंसूबे |
=
अलंकृत भंगिमाएँ भाव की मन-हिरण को मोहे !
बहुत अच्छे मुझे लगते तुम्हारे प्रेम के दोहे !!
=
अलौकिक कल्पना के दर्पणों में
रूप को झाँकूँ
कपोली – लालिमा पर ‘ अनुष्टुप ‘ के
गणों को टाँकूँ |
मगर अतृप्त मन फिर भी ‘यमक-अनुप्रास’ को टोहे !
बहुत अच्छे मुझे लगते तुम्हारे प्रेम के दोहे !!
-आचार्य विजय ‘ गुंजन ‘

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31 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Alka के द्वारा
February 19, 2014

आदरणीय आचार्य जी , बसंत कि ऋतू में रची एक प्रेममयी सुन्दर रचना …

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    February 20, 2014

    मान्या अलका जी, समर्थन के लिए हार्दिक आभार ! पुनश्च !

sanjay kumar garg के द्वारा
February 19, 2014

“मगर अतृप्त मन फिर भी ‘यमक-अनुप्रास’ को टोहे” बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए आभार! आचार्यवर!

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    February 19, 2014

    संजय गर्ग जी ! हार्दिक आभार !

सौरभ मिश्र के द्वारा
February 15, 2014

वाह आचार्य जी सुन्दर रचना

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    February 15, 2014

    सौरभ जी हार्दिक आभार !

deepakbijnory के द्वारा
February 14, 2014

मगर अतृप्त मन फिर भी ‘यमक-अनुप्रास’ को टोहे ! बहुत अच्छे मुझे लगते तुम्हारे प्रेम के दोहे !! वह कितनी khoobsurti से सब कुछ कह दिया सदर नमन विजय जी

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    February 15, 2014

    आदरणीय दीपक जी ! हार्दिक आभार ! पुनश्च !

RAJESH KOTWAL के द्वारा
February 14, 2014

सुन्दर रचना श्रीमान आप अपना रचना पर मार्गदर्शन करें http://swatantra.jagranjunction.com

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    February 15, 2014

    मान्य राजेश कोटवाल जी , नमस्कार ! मेरे ब्लॉग पर आप का हार्दिक स्वागत है ! प्रतिक्रियार्थ आभारी हूँ ! आप के द्वारा दिए लिंक पर यथा समय आता हूँ !

Madan Mohan saxena के द्वारा
February 14, 2014

सुन्दर अच्छी प्रेममयी रचना आभार मदन कभी इधर भी पधारें

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    February 15, 2014

    धन्यवाद मदन जी !

aman kumar के द्वारा
February 13, 2014

बहुत अच्छे मुझे लगते तुम्हारे प्रेम के दोहे !! आपकी क्या तारीफ़ कृरु

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    February 15, 2014

    अमन जी धन्यवाद !

DR. SHIKHA KAUSHIK के द्वारा
February 11, 2014

bahut sundar bhavabhivyakti .badhai

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    February 15, 2014

    शिखा जी अनुगृहीत हूँ !

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
February 11, 2014

आदरणीय आचार्य जी क्या बात है एक एक शब्द मन को छू गए धीरे धीरे पढता गया मन कल्पना में खोया रहा ..सुन्दर काव्य रचना …शुभ कामनाएं अपना साहित्य इन सब को संजोये अलौकिक कल्पना के दर्पणों में रूप को झाँकूँ कपोली – लालिमा पर ‘ अनुष्टुप ‘ के गणों को टाँकूँ | मगर अतृप्त मन फिर भी ‘यमक-अनुप्रास’ को टोहे ! बहुत अच्छे मुझे लगते तुम्हारे प्रेम के दोहे !! इस समय तो अभी पंजाब में , मेरी वो रचना लिखने के वक्त वहाँ था …घुमंतू जीवन जो है अपना स्नेह बनाये रखें भ्रमर ५

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    February 15, 2014

    हार्दिक धन्यवाद भ्रमर जी ! अब मुलाक़ात होती रहेगी !

sadguruji के द्वारा
February 11, 2014

आचार्यजी,इस भावपूर्ण कविता के लिए और साहित्य सरताज प्रतियोगिता में विजेता बनने के लिए आपको बहुत बहुत बधाई.

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    February 11, 2014

    आदरणीय सद्गुरु जी , सादर ! यह सब आप सबों की सद्भावना का ही प्रतिफल है | हार्दिक आभार !

neena के द्वारा
February 10, 2014

मगर अतृप्त मन ………….यही आपके अनेको कविता को जन्म देगा औए हमे पढ़ने का अवसर .बधाई आदरणीय गुंजनजी .

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    February 10, 2014

    मान्या नीना जी , नमन ! अगर यह सच है तो हार्दिक आभार ! पुनश्च !

ranjanagupta के द्वारा
February 10, 2014

आदरणीय आचार्य जी !रचना अपने धर्म का पालन करती दिखी !सुन्दर !भावपूर्ण !शब्दों का अद्वितीय संयोजन !और बेहद ह्रदय हारी !बहुत बहुत बधाई !!

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    February 10, 2014

    मान्या रंजना जी , सादर नमस्कार ! आप की यह अतिशय उदारता है ! हार्दिक आभार ! पुनश्च !

jlsingh के द्वारा
February 9, 2014

अलौकिक कल्पना के दर्पणों में रूप को झाँकूँ कपोली – लालिमा पर ‘ अनुष्टुप ‘ के गणों को टाँकूँ | मगर अतृप्त मन फिर भी ‘यमक-अनुप्रास’ को टोहे ! बहुत अच्छे मुझे लगते तुम्हारे प्रेम के दोहे !! क्या सर जी, यह नायिका तो फिर कालिदास की ही हो सकती है आचार्य जी तो केवल वर्णन कर रहे हैं. सादर नमन!

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    February 10, 2014

    मान्य भाई ! हार्दिक आभार सह नमन ! ” काव्येषु नाटकं रम्यं तत्र रम्या शकुंतला “

anilkumar के द्वारा
February 9, 2014

आदरणीय विजय गुंनज जी , प्रेम की अत्यन्त उत्कर्ष व्यंजना आनन्दित कर गई । बधाई ।

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    February 9, 2014

    आदरणीय अनिल जी , सादर ! उत्साहवर्धक प्रतिक्रियार्थ आभारी हूँ ! पुनश्च !!

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    February 9, 2014

    आदरणीय अनिल जी ; सादर ! उत्साहवर्धक प्रतिक्रियार्थ आभारी हूँ ! पुनश्च !

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
February 9, 2014

मगर अतृप्त मन फिर भी यमक -अनुप्रास को टोहे बहुत अच्छे मुझे लगते तुम्हारे प्रेम के दोहे .आपकी कविता की ये पंक्तिया मुझे अद्वतीय लगीं , विजय गुंजन जी ,लिखते रहिये ,

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    February 9, 2014

    हार्दिक आभार निर्मला जी ! सादर !


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