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कहो काव्यसुन्दरि.....

Posted On: 20 Feb, 2014 Others,कविता,Contest में

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beautiful-indian-women-painting-artकहो काव्यसुन्दरि ! तेरे किन-किन अंगों पर गीत लिखूँ !
अधर या कि नयनों में पलते पल-पल की प्रतिप्रीत लिखूँ !!
=
मुखमंडल पर मंदस्मित सी
भाव भरी भाषाएँ ,
हर क्षण बनती मिटतीं
क्षणभंगुर सी प्रत्याशाएँ |
=
उष्ण-उष्ण उच्छ्वसित तुम्हारी साँसों का संगीत लिखूँ !
कहो काव्यसुन्दरि! तेरे किन-किन अंगों पर गीत लिखूँ !!
=
धवल दंतपंक्तियाँ हास की
रचतीं नई ऋचाएँ ,
भवें तुम्हारी इंद्रधनुष की
गढ़तीं प्रत्यंचाएँ |
=
चंद्रवदनि ! बोलो छंदों की हार लिखूँ या जीत लिखूँ !
कहो काव्यसुन्दरि! तेरे किन-किन अंगों पर गीत लिखूँ !!
=
तन की रग-रग रजनीगंधा
अमलतास सा मन है ,
अलक राशि उलझी-उलझी यों
ज्यों अम्बर में घन है |
=
पीपल की छइयां – पनघट पर पलते पल की रीत लिखूँ
कहो काव्यसुन्दरि! तेरे किन-किन अंगों पर गीत लिखूँ !!
=
अनुपम है सौंदर्य तुम्हारा
अनुपम सी है शैली ,
दिशा-दिशा पुलकित कपोल की
अरुणाभा है फैली |
=
लहराती रेशम सी तेरी ज़ुल्फों का संगीत लिखूं !
कहो काव्यसुन्दरि! तेरे किन-किन अंगों पर गीत लिखूँ !!
आचार्य विजय ‘ गुंजन ‘

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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Alka के द्वारा
March 1, 2014

आदरणीय आचार्य जी , सुन्दर शब्दों से सजी हुई बेहद सुन्दर रचना | लहराती रेशम सी तेरी जुल्फों का संगीत लिखूं ……. बहुत खूब ……. बधाई …

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 1, 2014

    मान्या अलका जी ! सादर ! आप की हार्दिकता ही मेरा सम्बल है ! हार्दिक आभार !

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
February 22, 2014

आदरणीय संतलाल करूण जी, सादर अभिवादन ! भला आप की बातों को मैं कैसे काट सकता हूँ ! आप ने बिल्कुल सही कहा है |’हिरण्यक्षिणी’ शब्द का प्रयोग पहले पद्यपूर्ति के क्रम में आ गया था इसी वजह से सरलीकरण के कारण ऐसा हो गया अगर आप कहें तो इसे बदला जा सकता है ! हार्दिक आभार !

Santlal Karun के द्वारा
February 22, 2014

आदरणीय आचार्य गुंजन जी, रचना की दृष्टि से गीत अनुपम है, पर अपने को रोक नहीं पा रहा हूँ, इतने सुन्दर गीत में दो शब्द ‘रेशम’ और ‘ज़ुल्फों’ दाँतों में दो कंकड़ दी तरह फँस रहे हैं | कारण, पूरा गीत आरम्भ से अंत तक संस्कृत-हिन्दी शब्दावली का कलेवर जो लिये हुए है | खैर.., हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

sanjay kumar garg के द्वारा
February 21, 2014

“चंद्रवदनि ! बोलो छंदों की हार लिखूँ या जीत लिखूँ ! कहो काव्यसुन्दरि! तेरे किन-किन अंगों पर गीत लिखूँ !!” अतीव सुन्दर कविता! लय, ताल, गति, छंद-बध कविता, मैंने इस स्तर की कविताये केवल पाठ्यपुस्तकों में ही पढ़ी हैं, ब्लॉग पर इस स्तर की कवितायें बहुत कम देखने को मिलती है! ऐसी सुन्दर कविता के लिए बधाई व् आभार! आदरणीय आचार्य विजय गुंजन जी!

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    February 21, 2014

    आदरणीय संजय कुमार गर्ग जी , सादर सप्रेम ! अतिशय प्रेम व अप्रतिम सदाशयता देने के लिए हार्दिक बधाई !शेष फिर !!

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
February 21, 2014

अनुपम ,अद्वतीय ,अतुलनीय,श्रंगार रस का उदाहरन, विजय जी ,बहुत सुंदर रचना .हार्दिक बधाई .

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    February 21, 2014

    सम्मान्या निर्मला सिंह गौर जी , सादर नमस्कार !……. किन शब्दों में व्यक्त करूँ आभार ! बौने लगते सारे प्रत्याहार !! अनेकशः आभार !!!

ranjanagupta के द्वारा
February 21, 2014

बहुत ही सुन्दर मनोहर रचना !आचार्य जी !अनुपम !भूरिश:बधाई !!

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    February 21, 2014

    मान्या रंजना जी , सादर !.. बहुत खुशी हुई आप की प्रतिक्रिया पढ़कर ! हार्दिक आभार !!!

jlsingh के द्वारा
February 21, 2014

धवल दंतपंक्तियाँ हास की रचतीं नई ऋचाएँ , भवें तुम्हारी इंद्रधनुष की गढ़तीं प्रत्यंचाएँ | = चंद्रवदनि ! बोलो छंदों की हार लिखूँ या जीत लिखूँ ! कहो काव्यसुन्दरि! तेरे किन-किन अंगों पर गीत लिखूँ !! काव्य सुंदरी का अनुपम चित्रण! हार्दिक अभिनन्दन!

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    February 21, 2014

    आदरणीय भाई ! उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक बधाई ! सादर !

February 21, 2014

sundar chitratmak abhivyakti .badhai

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    February 21, 2014

    शालिनी जी , हार्दिक आभार !


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