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" अधर-पुट पाटलों की पंखुड़ी कुछ रागिनी छेड़े "

Posted On: 25 Feb, 2014 Others,कविता,Contest में

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गीत की गंध बनकर साँस में घुलने लगी हो तुम !
प्रीत के छंद बन-बन शब्द में ढलने लगी हो तुम !!
=
तुम्हारी भौंह धनुषी, भाव के
कुछ गुप्त मन्त्रों सी ,
कहे कुछ कान में अव्यक्त
उलझे वीण-तंत्रों सी |
=
प्रणय के प्राण बन अभिलाष में पलने लगी हो तुम !
गीत की गंध बनकर साँस में घुलने लगी हो तुम !!
=
कपोली लालिमा नभ के क्षितिज की
सांध्य वेला सी ,
लगे परिणाम रति में रत रती के
काम्य खेला सी |
=
प्रणी के भंग प्रण के हेतु अब छलने लगी हो तुम !
गीत की गंध बनकर साँस में घुलने लगी हो तुम !!
=
अधर-पुट पाटलों की पंखुड़ी
कुछ रागिनी छेड़े ,
उड़ेले प्राण में अमरित, श्रवण में-
बंसुरी टेरे |
सपन के पंख पर चढ़ आ सदा मिलने लगी हो तुम !
गीत की गंध बनकर साँस में घुलने लगी हो तुम !!
=
( इस गीतिक रचना के अंतिम चरण में संयोग श्रृंगार की पराकाष्ठा की पंक्तियाँ स्वतः स्फूर्त हो बलात् आयातित हो गईं हैं अतः उन पंक्तियों वाले चरण को यहाँ संकोचवश प्रस्तुत नहीं कर पा रहा हूँ | आप के समक्ष प्रस्तुत यह गीतिक रचना वस्तुतः चार चरणों का है | यहाँ तीन ही चरण प्रस्तुत है | ) — आचार्य विजय ” गुंजन “

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24 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 5, 2014

    सुन्दर शब्दों से सजा मनभावन मंतव्य के लिए हार्दिक आभार भाई ! पुनश्च !!

abhishek shukla के द्वारा
March 5, 2014

आचार्य जी! आपको शत -शत प्रणाम! बहुत दिन बाद कोई लाया बद्ध काव्य पढ़ने को मिला…बहुत सुन्दर शैली….आभार

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 5, 2014

    मान्य अभिषेक शुक्ल जी , सादर नमस्कार ! मनभावन प्रतिक्रियार्थ आभारी हूँ ! सहयोग व सम्बन्ध बनाए रखें ! पुनश्च !!

acharyashivprakash के द्वारा
March 4, 2014

आचार्य श्री बहुत उच्चकोटि की श्रगारिक रचना आपकी अद्भुत शिल्प दिखा …..बहुत बधाई….. …विरह श्रृंगार का वर्णन बहुत ही मन लुभाता है ….यमातागा मफाइलुन सभी कुछ समझ आता है ….न जाने क्यूं खुदा ऐसे भी बन्दों को रुला देता …..विधाता देख देख दुनिया को यहाँ दिल दिल जलाता है ……||

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 4, 2014

    मान्य भाई शिवप्रकाश जी , सादर नमस्कार !उत्कृष्ट भावों से भरी प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ !! पुनश्च !!

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
March 4, 2014

अधर-पुट पाटलों की पंखुड़ी कुछ रागिनी छेड़े , उड़ेले प्राण में अमरित, श्रवण में- बंसुरी टेरे | आदरणीय आचार्य जी एक से बढ़ कर एक सुन्दर मनभावन पंक्तियाँ , बहुत कुछ सीखने को मिलता है आप के पास आ, बधाई इस सुन्दर गीतिका के लिए ,अपना भारत महान , आप से लोग अभी भी संकोच , अब तो विज्ञापनो से ही ….एक बार की बात याद आयी ऐसी ही कुछ पंक्तियाँ आदरणीया रश्मि प्रभा जी ने अपने ब्लॉग पे उकेरा था बड़ी आलोचना और फिर उन्होंने उस रचना को वहाँ से मिटा ही दिया .. भ्रमर ५ भ्रमर ५

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 4, 2014

    मान्य भाई भ्रमर जी , सादर ! आप की मेरे प्रति सद्भावना और आप का आदर भाव सदैव मुग्ध कर जाता है !आदरणीय करुण जी का आदेश है तो अब उस बंध को रखना ही पड़ेगा | पुनश्च !!

Santlal Karun के द्वारा
March 3, 2014

आदरणीय आचार्य गुंजन जी, श्रृंगार की सात्विक विद्यमानता, क्रिया-प्रतिक्रिया, अपेक्षा, सृष्टि-सम्मत सहभाव तथा सत्य से सौन्दर्य की यात्रा में उसके सात्विक उपयोग-उपभोग में संकोच कैसा ? यह तो ऐसे हुआ जैसे किसी बच्चे को बार-बार कहना पड़े कि देखो बेटे अंकल आए हैं, इन्हें नमस्ते करो और बच्चा मारे शर्म के कुछ देर खड़ा रहे और फिर बिना नमस्ते किए मुँह फेर कर भाग खड़ा हो, दूसरे कमरे में घुस जाए | या फिर सुहागरात के लिए कुछ भली रिश्तेदार औरतें चुहल करती हुई आप को कमरे में धकेलकर बाहर से दरवाज़ा बंद कर दें और आप भले मानस कूदकर पंखे पर चढ़कर बैठ जाएँ तथा नवागत दुल्हन महोदया आप की हाल पर मंद-मंद मुस्काती, कुछ-कुछ हैरान-परेशान, कुछ-कुछ हक्का-बक्का अपना माथा पीटती रहें | अब भला ऐसे शर्म की कहाँ आवश्यकता है ? इसलिए कवि के सम्प्रेषण-संस्कार की यह माँग है कि आप चौथे बंध को यहाँ जोड़कर अपने चहेते पाठकों को उपकृत करें | … आगामी साहस के लिए पहले से साधुवाद एवं सद्भानाओं सहित |

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 4, 2014

    परम श्रद्धेय संतलाल करुण जी, सादर वंदे !! श्रद्धेय वर आप और आप की भाषा का कोई जवाब नहीं , मैं निरुत्तर हूँ और इसके अतिरिक्त दूसरा कोई रास्ता नहीं कि मैं उस अंतिम बंध को को यहाँ सार्वजनिक कर दूं | मैं पूर्ण आश्वत हूँ , आप का साथ जो है ! श्रद्धावनत !!

yamunapathak के द्वारा
March 3, 2014

gunjan jee yah bahut madhur geet rachana hai.

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 4, 2014

    हार्दिक आभार मान्या यमुना जी !! पुनश्च !!

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
February 28, 2014

ह्रदय के कोमल भावों से आच्छादित ,भाषा के अपूर्व सौंन्दर्य में गुंथी ,सुंदर ही नहीं सुंदर तम रचना .सादर बधाई ,विजय जी .

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    February 28, 2014

    सम्मान्या निर्मला सिंह गौर जी, साभिवादन ! आप की प्रतिक्रिया मन को अतिरंजित कर गई ! हार्दिक आभार !

sanjay kumar garg के द्वारा
February 26, 2014

“अधर-पुट पाटलों की पंखुड़ी कुछ रागिनी छेड़े , उड़ेले प्राण में अमरित, श्रवण में- बंसुरी टेरे | सपन के पंख पर चढ़ आ सदा मिलने लगी हो तुम !” अतीव सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए आभार!आदरणीय आचार्य जी!

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    February 28, 2014

    संजय गर्ग जी, सप्रेम नमस्कार !उत्साहवर्धक प्रतिक्रया के लिए ह्रदय से आभार !

deepakbijnory के द्वारा
February 25, 2014

ो अंतिम चरण प्रस्तुत na करने का संकोच prashanshneey है आज जब लोग कुछ भी लिखने से नहीं सकुचाते आपकी ये shaleenta निःसंकोच वंदनीय है आभार ऐसे लेखक को सदर नमन http://deepakbijnory.jagranjunction.com/2014/02/21/सपने/

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    February 25, 2014

    सम्मान्य वर दीपक जी , सादर ! एक शालीनता ही तो हम रचनाकारों का गहना है जब हम ही पथविचलित हो गए तो अगली पीढ़ी को देने के लिए बचेगा ही क्या ? तहेदिल से शुक्रिया !!

ranjanagupta के द्वारा
February 25, 2014

सुन्दरम् रचना हेतु बधाई ,स्वीकृत हो आचार्य श्री !प्रणय का यह मास धन्य हो गया !अति उत्तम मंच की यह सक्रियता सर्व हितकारी है !सादर !!

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    February 25, 2014

    सम्मान्या रंजना जी , साभिवादन !आप की अनोखी टिप्पणी ने रचना प्रक्रिया के क्षणों को सुवासित कर दिया | हार्दिक धन्यवाद !!

Pankaj Kumar Mishra Vatsyayan के द्वारा
February 25, 2014

आचार्यवर अति उत्तम श्रृंगार रचना, मानों कामदेव रति का वर्णन करना चाह रहे हों। मैं ज़यादा ज्ञानी नहीं हूँ, अतः कुछ और कह पानें में असमर्थ हूँ, मात्र इसके कि आप अत्यंत ही उच्च कोटि के काव्यों के प्रणेता हैं और उसी रूप में गिने जायेंगे। सधन्यवाद वात्स्यायन

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    February 25, 2014

    मान्य पंकज जी , सादर ! यह आप की सदाशयता बोल रही है | ऐसा प्रेम कि मैं गदगद हूँ ! हार्दिक आभार !!

Santlal Karun के द्वारा
February 25, 2014

आदरणीय आचार्य गुंजन जी, पहले तो “तुम्हारी भौंह धनुषी, भाव के कुछ गुप्त मन्त्रों सी,कहे कुछ कान में अव्यक्त, उलझे वीण-तंत्रों सी |” -जैसे अद्वितीय बंधों वाली इस श्रृंगार-श्लथ गीतिका के लिए ढेरों साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! दूसरे आप ने पाद-टिप्पणी देकर जिज्ञासा क्यों जगाई ? ई-मेल आई-डी दे रहा हूँ, प्लीज़ चौथा चरण मेल कर दें — santlalkarun@gmail.com

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    February 25, 2014

    आदरणीय संतलाल करुण जी, सादर प्रणतिः ! सबसे पहले तो आप के भाषा-सौष्ठव को मेरा नमन | आभार के लिए बराबरी के शब्द कहाँ से लाऊं ? आप के आदेश का पालन करता हुआ चौथा चरण मेल कर रहा हूँ ! विदुषामनुचर !!!


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