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याद फिर तेरी आई है .......

Posted On: 28 Feb, 2014 Others,कविता,Contest में

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बहुत दिनों के बाद याद फिर तेरी आई है !
स्मृतियों ने आकर चुपके से रची सगाई है !!
=
बीते पल वक – पंक्ति सरीखे
नभ से उतर रहे ,
मन के वातायन से अंतस -
पट पर पसर रहे |
=
वर्षों से सूखी घाटी फिर अब लहराई है !
बहुत दिनों के बाद याद फिर तेरी आई है !!
=
सुधियों की बारात, बिना -
परिछन के लौट रही,
वहीं धरी की धरी समूची
बातें जो न कही |
=
अभी कहानी बाकी जो अबतक न सुनाई है !
बहुत दिनों के बाद याद फिर तेरी आई है !!
=
एकाकीपन में तेरा जब
चित्र उभर आता ,
वर्त्तमान तब उस अतीत की
कविता लिख जाता |
=
जो न बही धारा अबतक बस वही बहाई है !
बहुत दिनों के बाद याद फिर तेरी आई है !!
आचार्य विजय ‘ गुंजन ‘

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28 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
March 14, 2014

आज  पुरुष्कृत होकर वो रचना सामने आई जो मुझ से अछूती रह गयी थी,सुंदर रचना ,बहुत ख़ुशी हुई ,हार्दिक बधाई ,विजय जी और होली की शुभ कामनाएं .

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 19, 2014

    मान्या निर्मला जी ; अभिवादन ! प्रतिक्रियार्थ व हार्दिकता हेतु हार्दिक आभार ! पुनश्च !!

ikshit के द्वारा
March 14, 2014

सर जी नमन है भावनाओ को जागरण-सम्मान पर बधाई… – इच्छित

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 19, 2014

    हार्दिक धन्यवाद इक्षित जी !शेष फिर !!

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 5, 2014

    मान्य भाई योगी सारस्वत जी , सप्रेम नमस्कार ! यह सब आप जैसे लोगों की सहृदयता का ही प्रतिफल है ! हार्दिक आभार !!

sanjeevtrivedi के द्वारा
March 3, 2014

गुंजन जी आपको सादर नमन आपकी कविता बहुत ही सुन्दर है संवाद बनाये रखियेगा….

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 4, 2014

    संजीव जी आभारी हूँ ! आप का सदैव मेरे ब्लॉग पर स्वागत है !

sanjay kumar garg के द्वारा
March 3, 2014

आदरणीय आचार्य जी! “सुन्दर यादमय” अभिव्यक्ति के लिए बहुत-बहुत बधाई! आदरणीय “नीरज जी” ने लिखा है-”चाँद को बाह में उलझाये लचकती बाहें, कोइ शरीफ, कोइ शोख लहर आती है, उड़ते पानी की तरह याद तेरी उड़-उड़कर, कभी दामन को, कभी दिल को भिगो जाती है!” सुन्दर “भावमय” कविता के लिए आभार! आचार्यवर!

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 4, 2014

    गर्ग जी सादर ! नीरज जी मेरे आदर्श हैं , एक-दो मंचों पर उनका आशीर्वाद भी मिला है | जब वे ” गीतकार ” पत्रिका ” के प्रमुख सम्पादक थे तो मैं बिहार से उस पत्रिका का एकमात्र साहित्य – प्रतिनिधि था उनके स्नेह के कारण ! आज आप ने उनका स्मरण करा दिया बहुत -बहुत आभार !1

yamunapathak के द्वारा
March 3, 2014

आज मैंने आपकी कई कविताएँ नोट की वह भी गुनगुनाते हुए. साभार

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 4, 2014

    गुनगुनाकर लिखने की प्रक्रिया ही तो गीत है , आप जब गुनगुनाती हैं तो निश्चित तौर पर आप गीत भी लिख सकती हैं वो भी उत्तम ! सादर !

ikshit के द्वारा
March 2, 2014

तेरा जब चित्र उभर आता , वर्त्तमान तब उस अतीत की कविता लिख जाता….. सर्वश्रेष्ठ अनुभव है यह – इच्छित

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 2, 2014

    प्रतिक्रियार्थ आभारी हूँ भाई इक्षित जी !! पुनश्च !!

Alka के द्वारा
March 2, 2014

आदरणीय आचार्य जी , बहुत ही सुन्दर मन को छूती कविता | मन प्राण में बसी यादें ही इतनी सुन्दर रचना का रूप ले सकती हैं.. बधाई ..

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 2, 2014

    आप ने ठीक कहा अलका जी ! हार्दिक आभार !

harirawat के द्वारा
March 1, 2014

जो न बहाई धारा वही बहाई है, बहुत दिनों के बाद याद फिर तेरी आई है ! वाह बहुत अच्छी कविता ! बधाई गुंजन जी, कुदरत से नाता जोड़कर, छायावादी छाता ओढकर, कदम बढ़ाए जा रहे हो, तन बदन को मोड़कर, कुछ बताओगे नहीं इरादा क्या है? कवियों की रेस जीतोगे दौड़ कर ! शुभ कामनाओं के साथ हरेन्द्र

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 2, 2014

    प्रवृत्तियाँ चाहे छायावादी हों या आशावादी , कभी मरतीं नहीं , मन के अवगुंठन खुलने भर की देर है | आदरणीय हरिरावत जी ! शुभकामनाओं के लिए बहुत-बहुत आभार ! पुनश्च !1

sadguruji के द्वारा
March 1, 2014

आदरणीय आचार्यजी,इस रचना के लिए सादर अभिनन्दन ! बहुत सुंदर रचना.ये पंक्तियाँ विशेष रूप से मन को छूकर बहुत कुछ याद दिलातीं हुई और भूतकाल को खींचकर वर्तमान में लातीं हुईं-एकाकीपन में तेरा जब चित्र उभर आता , वर्त्तमान तब उस अतीत की कविता लिख जाता | = जो न बही धारा अबतक बस वही बहाई है ! बहुत दिनों के बाद याद फिर तेरी आई है !!आपकी बहुत बहुत बधाई और बहुत सारी शुभकामनाएं.

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 2, 2014

    आदरणीय सद्गुरु जी , सादर प्रणतिः !! बस इसी तरह आप अपना आशीष देते चलें और मैं अपना काम करता चलूँ ! बहुत-बहुत आभार !!

ranjanagupta के द्वारा
March 1, 2014

सुन्दर रचना !आचार्य प्रवर !लगता है बसंत ने आप पर जादू कर दिया है !तभी आप की रचनाधर्मिता निर्मल जल धार सी सतत् प्रवहमान हो चली है !!बधाई !!

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 2, 2014

    सुधियों के सोपानों से चढ़ झाँक रहा मधुरिम अतीत ! हो गया आझ मन गीत-गीत चंदन से गंधित है प्रतीत !! क्या कहूँ रंजना जी! स्नातक ( प्रतिष्ठा ) अंतिम वर्ष की बातें स्मृतियों में अनुगूँज बन अब तक कौंध रही थीं, आज मुखर हो उक्त पंक्तियाँ आप के सामने है | इस तरह किसी का ऋण भी चुकता हो गया | वैसे उन सुखद क्षणों के ऋण को चुकता नहीं किया जा सकता ! बहुत-बहुत आभार !!

jlsingh के द्वारा
February 28, 2014

एकाकीपन में तेरा जब चित्र उभर आता , वर्त्तमान तब उस अतीत की कविता लिख जाता | क्या कहना है श्रद्धेय! और फिरसुधियों की बारात, बिना – परिछन के लौट रही, वहीं धरी की धरी समूची बातें जो न कही | एक से बढ़कर एक!

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 1, 2014

    हार्दिक आभार भाई आप के इस अपूर्व प्रेम के लिए ! पुनश्च !!

Ravinder kumar के द्वारा
February 28, 2014

विजय जी, सादर नमस्कार. कविता का रूप कुछ नवीन लगा. अंतस के भावों को कहती कविता के लिए आप को बधाई. एकाकीपन में तेरा जब चित्र उभर आता , वर्त्तमान तब उस अतीत की कविता लिख जाता | बेहतरीन कविता के लिए आपको बधाई. लिखते रहिये. नमस्कार.

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 1, 2014

    मान्य भाई रविंदर जी ! हार्दिक आभार आप की इस उत्साहवर्धक प्रतिक्रया के लिए ! पुनश्च !1

deepakbijnory के द्वारा
February 28, 2014

एकाकीपन में तेरा जब चित्र उभर आता , वर्त्तमान तब उस अतीत की कविता लिख जाता वाह विजय जी बहुत खूब http://deepakbijnory.jagranjunction.com/2014/02/14/प्रणय-निवेदन/

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 1, 2014

    हार्दिक आभार दीपक जी ! पुनश्च !


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