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हेरते पथ थके ये नयन .....

Posted On: 28 Feb, 2014 Others,कविता,Contest में

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हेरते पथ थके ये नयन !
तुम न आए हुए तिक्त क्षण !!
=
सूर्य सिर से खिसक कह रहा
आगमन की प्रतीक्षा न कर,
उग्र नदिया है चंचल बड़ी
आचमन की तितिक्षा न कर |
=
आज हित-साधना के लिए, आदमी का है होता चयन !
हेरते पथ थके ये नयन ….. !!
=
अर्क अब अस्त होने चला
आ गई साँझ की लालिमा,
फिर प्रकट कुछ क्षणों के लिए
भी हुई नक्त की कालिमा |
=
जो बिछा कुछ ही क्षण के लिए छँट गया वह घना आवरण !
हेरते पथ थके ये नयन ….. !!
=
आ क्षितिज पर उगा चाँद भी
हँस लगा छींटने चाँदनी,
और मन में दमकने लगी
सैकड़ों आस की दामिनी |
=
भावनाएँ रही थीं थकीं जो गईं करने को अब शयन !
हेरते पथ थके ये नयन ….. !!
आचार्य विजय ‘ गुंजन ‘

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20 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
March 6, 2014

अर्क अब अस्त होने चला आ गई साँझ की लालिमा, फिर प्रकट कुछ क्षणों के लिए भी हुई नक्त की कालिमा | = जो बिछा कुछ ही क्षण के लिए छँट गया वह घना आवरण ! हेरते पथ थके ये नयन ….. !! = आ क्षितिज पर उगा चाँद भी हँस लगा छींटने चाँदनी, और मन में दमकने लगी सैकड़ों आस की दामिनी | आपकी शब्द स्वतः ही मन को खींच ले जाते हैं श्री आचार्य जी ! खूबसूरत शब्दों के लिए बधाई !

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 8, 2014

    मान्य भाई योगी सारस्वत जी ; सप्रेम नमस्कार ! आप सबों की टिप्पणी ही तो रचना -प्रक्रिया का सम्बल है ! हार्दिक आभार भाई !!

yamunapathak के द्वारा
March 3, 2014

आपकी कविताएँ पढते समय खुद ब खुद गुनगुनाहट में तब्दील हो जाती हैं. साभार

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 4, 2014

    अतिशय आभार यमुना जी ! शेष फिर !!

sanjay kumar garg के द्वारा
March 3, 2014

“सूर्य सिर से खिसक कह रहा आगमन की प्रतीक्षा न कर, उग्र नदिया है चंचल बड़ी आचमन की तितिक्षा न कर |” अति सुन्दर अभिव्यक्ति! आदरणीय आचार्य जी! बधाई!

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 4, 2014

    हार्दिक आभार भाई गर्ग जी !

DR. SHIKHA KAUSHIK के द्वारा
March 2, 2014

बहुत सुन्दर .बधाई

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 2, 2014

    हार्दिक आभार ! डॉ. शिखा जी !!

deepakbijnory के द्वारा
March 2, 2014

आ क्षितिज पर उगा चाँद भी हँस लगा छींटने चाँदनी, और मन में दमकने लगी सैकड़ों आस की दामिनी | वाह विजय जी बहुत खूब http://deepakbijnory.jagranjunction.com/2014/01/31/गूँगी-चीख-कविता/

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 2, 2014

    हार्दिक आभार दीपक जी ! सादर!

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
March 1, 2014

और मन में दमकने लगीं सैंकड़ो आस की दामिनी , भावनाएं रहीं थीं थकी जो गयीं करने को अब शयन ,हेरते पथ थके ये नयन ,बहुत खूब  विजय जी ,शब्दों में भाव और भाव में शब्दों का बेजोड़ संगम.सादर बधाई .

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 2, 2014

    मान्या निर्मला जी , सादर अभिवादन ! मनभावन मंतव्य और प्रेम सिंचित हार्दिकता हेतु अतिशय आभार ! पुनश्च !

harirawat के द्वारा
March 1, 2014

आचार्य विजय गुंजन जी, सुन्दर कविता के लिए साधुवाद ! हरेन्द्र जागते रहो !

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 2, 2014

    प्रतिक्रियार्थ आभारी हूँ ! आदरणीय हरिरावत जी !! पुनश्च !

sadguruji के द्वारा
March 1, 2014

सूर्य सिर से खिसक कह रहा आगमन की प्रतीक्षा न कर, उग्र नदिया है चंचल बड़ी आचमन की तितिक्षा न कर | = आज हित-साधना के लिए, आदमी का है होता चयन.बहुत अच्छी कविता.इस रचना के लिए आपको बहुत बहुत बधाई.

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 2, 2014

    श्रद्धेय सद्गुरु जी, सादर !सद्भावना के लिए हार्दिक आभार ! पुनश्च !

ranjanagupta के द्वारा
March 1, 2014

आतुर प्रतीक्षा के क्षण !विवश प्राण ! पर फिर भी अंत नही ! ढल गया दिन ,सूरज का कहीं नाम नहीं !! ऐ बादे सबा अब भी ,तेरी शाम नही !! सादर !!आचार्य जी!!

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 1, 2014

    आदरणीया रंजना जी , सादर नमन ! हृदयस्पर्शी मंतव्य से उत्कंठा और बढ़ गई , साथ ही लेखन को बल भी ! तहेदिल से शुक्रिया !!

jlsingh के द्वारा
February 28, 2014

भावनाएँ रही थीं थकीं जो गईं करने को अब शयन ! हेरते पथ थके ये नयन ….. !! श्रद्धेय आचार्य जी, सादर अभिवादन! अति सुन्दर!

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 1, 2014

    हार्दिक आभार भाई जे.एल.सिंह जी ! प्रतिक्रिया से सम्बल मिला !! सधन्यवाद !!


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