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फागुनी कुंडलिया

Posted On: 17 Mar, 2014 Others,कविता,Hindi Sahitya में

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होली पर है चढ़ गया राजनीति का रंग
राजनाथ ने कर दिया टंडन को बदरंग ।
टंडन को बदरंग मनोहर हो बेगाने
चले कानपुर के लोगों में जोश जगाने ।
कह गुंजन कवि खुशियों से भर जाये झोली
लहर-लहर सबके सिर लहराए होली।।
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बन्दर बैठ दरख़्त पर रहा डाल झकझोर
बचे-ख़ुचे को बिग रहा है जमीन पर तोड़
है जमीन पर तोड़ गिरे चारों चित खाने
संभल संभल फिर रक्तबीज सा सीना ताने
कह गुंजन कविराय केजरी मस्तकलंदर
सबके सिर पर नाँच रहा है चढ़कर बंदर
————–
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लालू जी को ले डुबा वंशवाद का प्यार
साथ छोड़कर चल दिया बहुत पुराना यार
बहुत पुराना यार गिरा जा रामशरण में
मिला पाटलीपुत्र परमसुख तपश्चरण में
कह गुंजन पाकर प्रसाद हैं मस्त कृपालू
कुण्डलिया पढ़ पढ़कर अब हैं रोते लालू
————-
————-

मोदी जी मदमस्त हैं पा मोदी का प्यार
अश्विनी औ गिरिराज को रहे दुलत्ती मार
रहे दुलत्ती मार किया भोला से सौदा
सदाचरण को त्याग बेरहम बनकर रौंदा
कह गुंजन कवि नहीं यहाँ की जनता बोदी
संभलो अब भी समय शेष है चेतो मोदी
————
————

राग रंगों का त्यौहार यह होली आप सभी की झोली में
खुशियों के रंग भर दे इन्हीं कामनाओं व भावनाओं के साथ
आप सभी का अज़ीज

आचार्य विजय गुंजन

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22 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
April 4, 2014

आचायजी,सादर हरिस्मरण ! बहुत अच्छी व्यंग्य रचना.व्यंग्य रूपी रंग आपने हर नेता पर डाला है.इस रचना के लिए आपको बहुत बहुत बधाई.इधर बहुत दिनों से आपकी नई रचना पढ़ने को नहीं मिली है.मुझे उम्मीद है कि आप हम सब की ये इच्छा शीघ्र पूरी करेंगे.नीचे वाला कमेंट पढ़कर बुरा लगा.कविता की समझ नहीं है तो ऐसे निरर्थक कमेंट नहीं करना चाहिए.आप इस और ध्यान मत दीजिये और अपनी लाजबाब कवितायेँ मंच पर प्रस्तुत करते रहिये.मेरी हार्दिक शुभकामनाएं स्वीकार कीजिये.

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    April 16, 2014

    श्रद्धेय सद्गुरु जी, सादर अभिवादन ! इधर हाल के दिनों में तबीयत ठीक-ठाक नहीं रही साथ ही कार्याधिक्य और उत्तरदायित्वों में भी उलझा रहा , अब मंच पर बने रहने की कोशिश करूंगा | नीचे की प्रतिक्रिया पूर्वाग्रहपूर्ण और कुछ अटपटी सी लगी | आप जैसे सिद्ध पुरुषों का प्रेम सदैव अनुप्राणित करता है ! एक सामयिक रचना शीघ्र ही पोस्ट कर रहा हूँ ! सादर !!

drshyamgupta के द्वारा
March 27, 2014

खालिश वकवास ..इसका होली या फागुन से क्या लेना देना…

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 27, 2014

    अब आप उनसे पूछिए जो ऐसे अवसरों पर इस तरह के बकवास छापते हैं और लिखने को प्रेरित भी करते हैं | आप उन तमाम पत्र-पत्रिकाओं से भी पूछिए जो होली के अवसर पर हास्य-व्यंग्य व कटाक्ष के रूप में ऐसी ही सामग्रियाँ मांग-मांग कर छापते हैं ! अलं प्रपंचनीयम् !!

    DR. SHIKHA KAUSHIK के द्वारा
    March 27, 2014

    rachna ke liye aise shabd prayog nahi kiye jane chahiye .sundar kundaliyan rachne hetu vijay ji ko badhai .

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 30, 2014

    शिखा जी ! हार्दिक धन्यवाद !!

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 24, 2014

    मान्य भाई सारस्वत जी आभार !

vaidya surenderpal के द्वारा
March 23, 2014

बहुत ही बढ़िया कुण्डलियाँ आदरणीय विजय जी, बधाई ।

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 24, 2014

    हार्दिक आभार मान्यवर ! सादर !!

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
March 23, 2014

आचार्य जी आप तो होली पर राजनीती की फागुनी कुंडलियां मार कर काका हाथरसी को जीवंत कर चुके हो पुनर्जागरण के लिए गुंजन सुमधुर हो गया   बधाई    ओम शांति शांति शांति 

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 24, 2014

    श्रद्धेय हरिश्चंद्र जी , सादर प्रणतिः ! आप का मेरे ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है साथ ही विनम्र आग्रह भी कि आगे भी आप मेरे साथ बने रहेंगे | सुन्दर सराहना के शब्दों के लिए अतिशय आभार ! पुनश्च !!

rameshbajpai के द्वारा
March 23, 2014

प्रिय श्री गुंजन जी फागुन की कटीली बयार तिस पर कुंडलियो की फुहार क्या गजब हुआ | बहुत खूब | मै आपके उस ब्लॉग पर भी गया था | रोचक अनुभव मिला | बधाई

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 24, 2014

    मान्यवर रमेश बाजपाई जी , सादर ! सर्वप्रथम मेरे ब्लॉग पर आप का हार्दिक स्वागत है ! सराहना के सुन्दर शब्दों के लिए आभारी हूँ ! आप और अन्य किस ब्लॉग की बात कर रहे हैं कृपया स्पष्ट करें ! पुनश्च !!

ranjanagupta के द्वारा
March 22, 2014

होली के रंग में कुण्डलियोँ का संग !और राजनीति की अनोखी पिच कारी !बहुत सुन्दर आचार्य श्री !!

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 24, 2014

    रंजना जी ! हार्दिक धन्यवाद ! इधर उत्तरपुस्तिकाओं के मूल्यांकन कार्य में अतिव्यस्त रहने के कारण मंच पर कम आ पा रहा हूँ ! दो-तीन दिनों में फिर से पूर्ववत हो जाउंगा ! पुनश्च !

sanjay kumar garg के द्वारा
March 20, 2014

“लालू जी को ले डुबा वंशवाद का प्यार साथ छोड़कर चल दिया बहुत पुराना यार” सुन्दर कुंडलियां! आदरणीय गुंजन जी!

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 24, 2014

    प्रतिक्रियार्थ आभारी हूँ ! बहुत-बहुत आभार गर्ग जी !!

deepak pande के द्वारा
March 18, 2014

बहुत ही मनोरंजन दायक कुण्डलियाँ आदरणीय विजय जी पूरी राजनीती बयां कर DEE इनके द्वारा

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 19, 2014

    धयवाद दीपक जी ! शेष फिर !!

jlsingh के द्वारा
March 17, 2014

मोदी जी मदमस्त हैं पा मोदी का प्यार अश्विनी औ गिरिराज को रहे दुलत्ती मार रहे दुलत्ती मार नवादा रास न आया एक और कुर्बानी का यूं मन है बनाया कह गुंजन कवि नहीं यहाँ की जनता बोदी संभलो अब भी समय शेष है चेतो मोदी बीच में दो पंक्तियाँ घुसा दी है मान्यवर, इधर भाजपा का सारा श्रम केजरीवाल को साधने में लगा है, और केजरीवाल भी तो शेर से टकराने चला है. बाबा विश्वनाथ की नगरी में भोले बाबा किसके नाथ बनेंगे और कौन अनाथ होपगा यह तो वक्त ही बतायेगा…. आर एस एस और मोदी जी का समझौता एक्सप्रेस को भी देखना होगा राजनाथ जी राष्ट्र को नाथते हैं या बीच में ही ठिठक कर रह जाते हैं…. जो भी होगा रोचक होगा.

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    March 19, 2014

    हार्दिक आभार भाई ! अब आगे के रोचक खेल की प्रतीक्षा है ; देखिए आगे-आगे होता है क्या ? प्रेम -रससिद्ध कवि के सम्मान हेतु आप को अतिरिक्त बधाई !!


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