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गीत चेतना की दो कविताएँ

Posted On: 1 Jun, 2015 कविता,Hindi Sahitya,Others में

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———-
एक

हो गया आज मन गीत-गीत
चन्दन से गंधित है प्रतीत !

अलसाईं कलियों ने खोले, हँसकर-
अपने दो मदिर नयन
जिनमें हो बंद रहे करते भर रात
भ्रमर के वृन्द शयन

अब सुधियों के सोपानों से चढ़
झाँक रहा मधुरिम अतीत !
हो गया आज मन गीत-गीत!!

सरि-सर-पोखर-तालाबों के
जल में हो गई शुरू हलचल
तट पर गावों की बालाएँ
हैं स्नान कर रहीं तन मल-मल

पलकों में प्रियतम की छवि को
कर बंद रहीं हैं पाल प्रीत !
हो गया आज मन गीत-गीत!!

मंदिर में घंटों के टन-टन स्वर
सुनने में आते पल-पल
हैं स्रोत भक्ति के फूट रहे
अन्तस्तल में अविरल-निर्मल

सम्पूर्ण बाह्य-अभ्यन्तर के
परिवेश हुए पावन-पुनीत!
हो गया………

दो

बहुत दिनों के बाद याद फिर
तेरी आई है !
स्मृतियों ने आकर चुपके से रची
सगाई है !!
बीते पल वक-पंक्ति सरीखे
नभ से उतर रहे
मन के वातायन से अंतस-
पट पर पसर रहे

वर्षों से सूखी घाटी फिर
अब लहराई है !
बहुत दिनों के बाद याद फिर
तेरी आई है !!

यादों की बारात बिना परिछन के
लौट रही
वहीं धरी की धरी अधूरी बातें
बातें जो न कही
अभी कहानी बाकी जो अबतक न
सुनाई है !
बहुत दिनों के बाद याद फिर
तेरी आई है !!

एकाकीपन में तेरा जब चित्र
उभर आता
वर्तमान तब उस अतीत की
कविता लिख जाता

जो न बही धारा अबतक बस
वही बहाई है !
बहुत दिनों के बाद याद फिर
तेरी आई है !!

– आचार्य विजय गुंजन

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12 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    June 7, 2015

    मान्य भाई योगी सारस्वत जी , सप्रेम नमस्कार ! अंतराल बाद आप से रूबरू होते हुए काफी हर्ष की अनुभूति हो रही है | प्रतिक्रिया अच्छी लगी | हार्दिक आभार !

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    April 19, 2016

    प्रतिक्रियार्थ आभार भाई सारस्वत जी !

sadguruji के द्वारा
June 2, 2015

जो न बही धारा अबतक बस वही बहाई है ! बहुत दिनों के बाद याद फिर तेरी आई है !! बहुत सुन्दर रचनाएँ ! बहुत बहुत अभिनन्दन और बधाई ! आदरणीय आचार्या जी ! बहुत दिनों के बाद मंच पर आपके वैचारिक दर्शन हुए ! आपका स्वागत है !

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    June 3, 2015

    परम् श्रद्धेय सद्गुरु जी , सादर अभिवादन ! सुन्दर सराहना के लिए आभारी हूँ! आपका आशीर्वचन सदैव प्रेरित करता है…

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
June 1, 2015

बहुत दिनों के बाद आपकी कविता आई है ,आदरणीय विजय जी ,सुन्दर रचनाएँ .

    jlsingh के द्वारा
    June 2, 2015

    मैं भी यही कहना चाहता था. मंदिर में घंटों के टन-टन स्वर सुनने में आते पल-पल हैं स्रोत भक्ति के फूट रहे अन्तस्तल में अविरल-निर्मल सम्पूर्ण बाह्य-अभ्यन्तर के परिवेश हुए पावन-पुनीत! हो गया आज मन गीत-गीत!!……… बीच बीच में दर्शन दे दिया करें! आदरणीय गुंजन जी!

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    June 3, 2015

    मान्या निर्मला जी , नमस्ते ! काफी अंतराल बाद आप की प्रतिक्रया से उत्साहित हुआ ! हार्दिक आभार …..

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
June 3, 2015

आदरणीय भाई, सप्रेम नमस्कार !आप की सुन्दर प्रतिक्रिया से रचना शीलता धन्य हुई ! आभारी हूँ

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
June 7, 2015

आदरणीया शोभा जी , सादर अभिवादन ! सराहना के सुन्दर शब्दों के लिए आभारी हूँ | पुनश्च !

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
February 13, 2016

Sarahna ke sundar shabdon ke lie aap kaa bahu-बहुत आभार ….. आदरणीया शोभा जी !!

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
April 19, 2016

हार्दिक आभार आदरणीया शोभा जी !


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